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कानपुर में है 350 साल पुराना मां काली का मंदिर…मन्नत मांगने के लिए बांधते हैं ताला, पूरी होने पर खोलते हैं

बंगाली मोहाल स्थित मां काली का प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध, नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु

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कानपुर, 18 अक्टूबर 2026। कहीं मन्नत पूरी होने के लिए धागा बांधा जाता है तो कहीं चुनरी चढ़ाई जाती है, लेकिन कानपुर के बंगाली मोहाल स्थित मां काली के प्राचीन मंदिर में मनोकामना मांगने का तरीका अनूठा है। यहां श्रद्धालु अपनी मुराद लेकर आते हैं और मंदिर परिसर में ताला बांध देते हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर भक्त वापस आकर उसी ताले को खोलते हैं। इसी अनूठी परंपरा के कारण करीब 350 वर्ष पुराना यह मंदिर ताला वाली माता के नाम से प्रसिद्ध है। सालभर श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जबकि नवरात्र के दौरान भक्तों की भीड़ कई गुना बढ़ जाती है।

पीढ़ियों से मां काली की सेवा में जुटा बंगाली परिवार

मंदिर के इतिहास को लेकर स्थानीय स्तर पर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यह धाम कई शताब्दियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। एक बंगाली परिवार की कई पीढ़ियां मां काली की पूजा-अर्चना और मंदिर की व्यवस्था संभालती आ रही हैं। मंदिर के पुजारी पंडित आकाश बनर्जी के अनुसार, यहां लंबे समय से धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जा रहा है। श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि मां के प्रति समर्पण और विश्वास का प्रतीक भी है। हालांकि, मंदिर की स्थापना के समय और उससे जुड़े शुरुआती प्रसंगों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

ताला बांधकर मांगते हैं मनोकामना

मंदिर की सबसे खास परंपरा मन्नत मांगने के लिए ताला बांधना है। श्रद्धालु मां काली के समक्ष अपनी मनोकामना रखते हैं और मंदिर परिसर में ताला बांधकर उसकी चाभी अपने पास सुरक्षित रखते हैं। स्थानीय मान्यता है कि जब उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है तो वे दोबारा मंदिर पहुंचकर ताला खोलते हैं। कुछ श्रद्धालु अपनी मुराद पूरी होने की प्रार्थना के साथ मां के नाम की चुनरी भी बांधते हैं। मनोकामना पूरी होने पर चुनरी खोलकर मां का श्रृंगार कराते हैं। इस तरह ताला और चुनरी दोनों ही भक्तों की आस्था से जुड़ी परंपराओं का हिस्सा बन गए हैं।

पुजारी आकाश बनर्जी बताते हैं कि ताला बांधकर मन्नत मांगने की परंपरा के कारण मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में ताले दिखाई देते हैं। समय के साथ यह परंपरा मंदिर की विशिष्ट पहचान बन गई है। हालांकि, ताले अधिक होने के कारण कई बार श्रद्धालुओं को अपना ताला तलाशने में परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में कुछ भक्त ताले की चाभी मां के चरणों में अर्पित कर देते हैं।

महिला के सपने से जुड़ी है ताला वाली माता की कथा

मंदिर को ताला वाली माता कहे जाने के पीछे एक लोककथा भी प्रचलित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, काफी समय पहले एक महिला अपने जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए नियमित रूप से मां काली के दर्शन करने आती थी। एक दिन उसने मंदिर परिसर में ताला बांधना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि जब वहां मौजूद पुजारी ने महिला से ताला बांधने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मां ने उसे सपने में दर्शन देकर ऐसा करने के लिए कहा है। महिला को विश्वास था कि ताला बांधने से उसकी मनोकामना पूरी हो जाएगी। लोककथा के मुताबिक, कुछ समय बाद मंदिर की दीवार पर उसकी मनोकामना पूरी होने का संदेश लिखा मिला। इसके बाद महिला दोबारा मंदिर में दिखाई नहीं दी। स्थानीय लोग इस घटना को मंदिर में ताला बांधने की परंपरा और ताला वाली माता नाम से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इस कथा की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पुजारी आकाश बनर्जी के अनुसार, आज भी श्रद्धालु इसी विश्वास के साथ मां के दरबार में अर्जी लगाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

नवरात्र में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़

शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में मां काली के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। शनिवार को भी भक्तों की आवाजाही बनी रहती है। पुजारी आकाश बनर्जी की देखरेख में मंदिर की पूजा परंपराएं जारी हैं। शहर की संकरी गलियों के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी परंपरा और लोककथाओं के कारण अलग पहचान रखता है। यहां बांधे गए ताले श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं और उनके अटूट विश्वास के प्रतीक माने जाते हैं।

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