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समुदाय को लाभार्थी के बजाय बराबर का भागीदार मानने से टिकाऊ बनेगा सामाजिक उद्यम

Treating the community as an equal partner rather than a beneficiary will make the social enterprise sustainable.

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समुदाय को लाभार्थी के बजाय बराबर का भागीदार मानने से टिकाऊ बनेगा सामाजिक उद्यम

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में आयोजित हुआ उद्यमिता से जुड़े विषयों पर विशेष संवाद, क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन की संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मयूरा बालासुब्रमण्यम के साथ साहस फाउंडेशन इन्क्लूसिव रिसोर्स सेंटर के संस्थापक शहाब नक़वी ने किया संवाद

देहरादून, 25 सितम्बर 2026,: सामाजिक उद्यमिता में सफलता के लिए सिर्फ जुनून और नए विचार ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या नहीं करना चाहिए। सामाजिक उद्यम को टिकाऊ बनाने के लिए समुदाय को लाभार्थी के बजाय बराबर का भागीदार मानना, वित्तीय आत्मनिर्भरता, अनुशासन और असफलताओं से सीखने का धैर्य जरूरी है। यह बातें क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन की संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मयूरा बालासुब्रमण्यम ने शुक्रवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में ‘जब आप एक सामाजिक उद्यमी हैं या सामाजिक उद्यमी बनने के बारे में सोच रहे हैं, तब आपको क्या-क्या नहीं करना चाहिए’ विषय पर  आयोजित विशेष संवाद में कहीं।

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मयूरा बालासुब्रमण्यम के साथ साहस फाउंडेशन इन्क्लूसिव रिसोर्स सेंटर के संस्थापक शहाब नक़वी ने संवाद किया। बातचीत की शुरुआत करते हुए मयूरा बालासुब्रमण्यम ने कहा कि सामाजिक उद्यमिता पर आमतौर पर यह बताया जाता है कि क्या करना चाहिए, जबकि वास्तविक सीख कई बार उन गलतियों से मिलती है, जो किसी उद्यम की यात्रा के दौरान होती हैं। अपने लगभग दो दशकों के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन ने देशभर के शिल्पकारों, विशेषकर महिला शिल्पकारों और हाशिये के समुदायों के पारंपरिक कौशल को समकालीन डिजाइन और बाजार से जोड़ने का काम किया है।

उन्होंने कहा कि सामाजिक उद्यमिता में केवल दया या सहानुभूति के आधार पर कोई टिकाऊ मॉडल विकसित नहीं किया जा सकता। शिल्पकार को लाभार्थी के रूप में देखने के बजाय उसे बराबर का भागीदार और अपने ज्ञान एवं कौशल का धारक मानना जरूरी है। उन्होंने नए उद्यमियों की उन प्रवृत्तियों का भी उल्लेख किया, जिनमें वे हर समस्या का समाधान स्वयं करने की जल्दबाजी करते हैं। कई परिस्थितियों में ‘न’ कहना और समुदाय को स्वयं निर्णय लेने का अवसर देना ही वास्तविक सशक्तीकरण का रास्ता बनता है।

मयूरा बालासुब्रमण्यम ने फंडिंग के पीछे लगातार भागने, बिना आवश्यकता के उद्यम को तेजी से विस्तार देने और बाजार के दबाव में परंपरा व गुणवत्ता से समझौता करने को सामाजिक उद्यमिता की प्रमुख चुनौतियों में गिनाया। उन्होंने कहा कि जुनून के साथ वित्तीय अनुशासन, आत्मनिर्भरता और असफलता से सीखने की क्षमता किसी भी सामाजिक उद्यम की दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक है।

शहाब नक़वी ने संवाद को उत्तराखंड और देहरादून के संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि पहाड़ में सामाजिक उद्यमिता की व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं। स्थानीय हस्तशिल्प, जैविक उत्पाद, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समावेशी शिक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए युवाओं को तात्कालिक परिणामों के बजाय दीर्घकालिक दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि समावेशी विकास तभी सार्थक है, जब दिव्यांगजन, महिलाएँ और वंचित समुदाय विकास की प्रक्रिया के किनारे नहीं, बल्कि उसके केन्द्र में हों। साहस फाउंडेशन इन्क्लूसिव रिसोर्स सेंटर इसी दृष्टिकोण के साथ कार्य कर रहा है।

संवाद के बाद खुले प्रश्नोत्तर सत्र में लोगों ने सामाजिक उद्यम शुरू करने, सीमित संसाधनों में काम करने और पहाड़ के स्थानीय उत्पादों को शहरी बाजारों से जोड़ने से संबंधित सवाल पूछे। दोनों वक्ताओं ने अपने व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर इन सवालों के जवाब दिए। कार्यक्रम में शिल्प संगठनों से जुड़े लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा शहर के अनेक प्रबुद्ध नागरिकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस मौके पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी भी मौजूद रहे।

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