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मां से मिलने आज माणा के माता मूर्ति मंदिर जाएंगे भगवान बदरी नारायण

Lord Badri Narayan will visit the Mata Murti Temple in Mana today to meet His mother.

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मां से मिलने आज माणा के माता मूर्ति मंदिर जाएंगे भगवान बदरी नारायण

हर साल भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को बदरीनाथ धाम में होता है माता मूर्ति मेले का आयोजन, मंगलवार को बदरीशपुरी के रक्षक घंटाकर्ण महाराज को दिया गया माता मूर्ति मंदिर आने का न्योता

देहरादून, 22 सितंबर 2026: वामन द्वादशी के अवसर पर बुधवार को भगवान बदरी नारायण अपनी मां से मिलने माणा गांव स्थित माता मूर्ति मंदिर जाएंगे। इसके लिए तैयारियां कर ली गई हैं। इसी कड़ी में मंगलवार को बदरीशपुरी के रक्षक घंटाकर्ण महाराज को माता मूर्ति मंदिर आने का न्योता दिया गया।

परंपरा के अनुसार भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को बदरीनाथ धाम के रावल की अगुआई में भगवान नारायण के प्रतिनिधि उद्धवजी माता मूर्ति की कुशलक्षेम जानने माणा गांव स्थित माता मूर्ति मंदिर पहुंचते हैं। यहां माणा के महिला मंगल दल सदस्यों और श्रद्धालुओं की ओर से उन्हें जौ की हरियाली भेंट की जाती है। इसके बाद उद्धवजी का मंदिर में माता मूर्ति से भावपूर्ण मिलन होता है। श्री बदरीनाथ-केदानाथ मंदिर समिति के उपाध्यक्ष ऋषि प्रसाद सती ने बताया कि उत्सव में शामिल होने के लिए मंगलवार शाम तक हजारों श्रद्धालु बदरीनाथ धाम पहुंच चुके थे। मंदिर समिति के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ ने बताया कि बुधवार सुबह दस बजे उद्धवजी माता मूर्ति मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। वहां दिन में पूजा-अर्चना व अभिषेक होगा और दोपहर के भोग के बाद अपराह्न तीन बजे उद्धवजी बदरीनाथ धाम के लिए प्रस्थान करेंगे।

छह घंटे मंदिर में दर्शन नहीं कर पाएंगे श्रद्धालु

मेले के चलते सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक बदरीनाथ धाम के कपाट बंद रहेंगे। उद्धवजी के धाम वापस लौटने पर ही मंदिर में दर्शन शुरू होंगे। शाम को माता मूर्ति मेला विराम लेगा और परंपरा के अनुसार भगवान नारायण के खजांची कुबेरजी के पश्वा मंदिर में स्नान करेंगे। इस अवसर पर आइटीबीपी, सेना व दानियों की ओर से भंडारे आयोजित किए जाएंगे।

बदरीशपुरी का भ्रमण कर सकेंगे रावल

माता मूर्ति मेले का बदरीशपुरी की धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान है। धाम के रावल को अलकनंदा नदी पार करने की अनुमति माता मूर्ति मेले के बाद ही मिलती है। मान्यता है कि वामन द्वादशी पर भगवान नर-नारायण के माता मूर्ति से मिलने के बाद रावल के बदरीशपुरी में कहीं भी आने-जाने की राह खुल जाती है। पीढ़ियों से चली परंपरा के अनुसार इससे पूर्व तक रावल अपने आवास और मंदिर के बीच ही आवाजाही कर सकते हैं।

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