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एक नाम नहीं, जिजीविषा है ‘अलकनंदा सुत’

'Alaknanda Sut' is not just a name, it is a will to live

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एक नाम नहीं, जिजीविषा है ‘अलकनंदा सुत’

प्रवासी लेखक अर्चना पैन्यूली के इस उपन्यास का दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में हुआ लोकार्पण, ‘अलकनन्दा सुत’ जैसी कहानियां लिखी नहीं जातीं, वह तो पहाड़ की मिट्टी में उपजती हैं,  वहां की हवा में गूंजती हैं और फिर नदी के शोर में गुम हो जाती हैं।

देहरादून 2 जनवरी, 2026: दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में शुक्रवार को समकालीन हिंदी साहित्य की चर्चित प्रवासी लेखक अर्चना पैन्यूली की नवीन उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान उपन्यास पर चर्चा भी हुई, जिसमें साहित्य, प्रशासन और बौद्धिक जगत से जुड़े प्रतिष्ठित लोग शामिल हुए।

उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ में लेखक ने भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के विविध पक्षों को सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है। पुस्तक का प्रकाशन देश के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान वाणी प्रकाशन ने किया है। उपन्यास का मुख्य किरदार शिवानन्द गैरोला, महज़ एक नाम नहीं, जिजीविषा है, जो गढ़वाल की घाटियों में राह बनाती है, चट्टानों से टकराती है, थकती है पर हार नहीं मानती। मानव के अदम्य मनोबल का मूर्तमान शिवानन्द कभी रुकता नहीं है। वह चलता है, बस चलता रहता है। वक्ताओं ने कहा कि अलकनन्दा सुत जैसी कहानियां लिखी नहीं जातीं, वह तो पहाड़ की मिट्टी में उपजती हैं,  वहां की हवा में गूंजती हैं और फिर नदी के शोर में गुम हो जाती हैं।

साहित्यकर एवं पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा कि ‘अलकनंदा सुत’ मानव जीवन का एक प्रकार से विश्वकोश है।‘ वरिष्ठ लेखक सुधारानी पांडे ने पुस्तक को पहाड़ के जीवन-संघर्षों की संवेदनशील अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने कहा, ‘अर्चना सात समन्दर पार प्रवासी जीवन में हिदी और भारतीय साहित्य के महत्व के साथ उत्तराखंड के गौरव को भी नहीं भूली हैं।‘ पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने कहा, ‘अलकनंदा सुत’ में पहाड़ी ग्रामीण परिवेश और पहाड़ के संघर्षों का सजीव चित्रण देखने को मिलता है।‘

शिवानी की परंपरा को आगे बढ़ा रहीं अर्चना

साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा, ‘अर्चना यूरोप के छोटे-से देश डेनमार्क में रहकर भी अपने उपन्यासों से हिन्दी पाठकों को प्रवासी भारतीय जीवन का नया स्वाद देती रही हैं। इससे पहले उनका उपन्यास ‘ह्वेयर डू आई बिलांग’ वैश्विक स्तर पर चर्चित और पुरस्कृत हो चुका है। नया उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ उत्तराखंड के कठिन पर्वतीय जीवन को बड़ी बारीकी से चित्रित करता है। इसमें गढ़वाल की आंचलिक विरासत का वह ताना-बाना है, जो अलकनंदा नदी की भांति ही दुर्गम पहाड़ी मार्गों पर चट्टानों से टकराती हुई अग्रसर हुई है। इस दृष्टि से अर्चना, शिवानी की परंपरा को आगे बढ़ाती हुई दिखती हैं।‘

भाषाविद् सरोजिनी नौटियाल ने लेखक के साहित्यिक योगदान से परिचित कराया। लेखक अर्चना पैन्यूली ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा, “मेरे लिए यह क्षण केवल एक साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि गहरा भावनात्मक अनुभव है। अपने मूल शहर देहरादून में साहित्यिक हस्तियों, मित्रों, पारिवारिक जनों और स्नेही पाठकों की उपस्थिति में ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण होना मेरे लिए अत्यंत गौरव की बात है।”

इससे पूर्व, कार्यक्रम के सुभारंभ पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के निदेशक एन. रविशंकर व कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथियों एवं साहित्य प्रेमियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, डॉ. योगेश धस्माना, डॉली डबराल, राजीव नयन बहुगुणा, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, भारती मिश्रा, सुप्रिया रतूड़ी, हरिचंद निमेश, मदन मोहन कण्डवाल, सोमवारी लाल उनियाल, मोहन सिंह, जय भगवान गोयल, डाॅ. लालता प्रसाद, डीके पाण्डे, बैचेन कण्डवाल, जगदीश बाबला, शिव मोहन सिंह, देवेन्द्र कांडपाल, कुलभूषण नैथानी, आलोक सरीन, ललित राणा समेत शहर के प्रबुद्धजन, साहित्यकार, पाठक, साहित्य प्रेमी आदि  उपस्थित रहे। संचालन साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने किया।

अर्चना की नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं अब तक प्रकाशित

लेखक अर्चना पैन्यूली 1997 से डेनमार्क में निवास कर रही हैं। वहां वे नॉर्थ सीलैंड इंटरनेशनल स्कूल में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं। कथा-साहित्य में उनकी विशिष्ट पहचान है। उनकी रचनाओं में स्कैंडिनेवियन प्रायद्वीप, विशेषकर डेनमार्क के मानवीय जीवन, सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना और राजनीतिक व भौगोलिक परिवेश का गहन एवं सजीव चित्रण मिलता है। अर्चना की अब तक नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने डेनिश साहित्य की कई  कृतियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। डेनिश समाज पर केन्द्रित हिन्दी में लिखा गया उनका उपन्यास वेयर डू आई बिलांग अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ  है। उनका चर्चित उपन्यास कैराली मसाज पार्लर हिन्दी के अलावा अंग्रेजी, मराठी और कन्नड़ भाषा में भी उपलब्ध है।

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