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आइये! आज से उत्तराखंड हिमालय में फूलों की जन्नत की सैर करें
Come! Visit the flower paradise of the Uttarakhand Himalayas starting today.

आइये! आज से उत्तराखंड हिमालय में फूलों की जन्नत की सैर करें

चमोली जिले में समुद्रतल से 12,995 फीट की ऊंचाई पर 87.5 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली हुई है विश्व धरोहर फूलों की घाटी, एक जून से 31 अक्टूबर तक खुली रहती है पर्यटकों के लिए, 500 से अधिक प्रजाति के खिलते हैं यहां फूल

देहरादून, 31 मई 2026: देश-दुनिया के पर्यटक अब सोमवार से चमोली जिले में समुद्रतल से 12,995 फीट की ऊंचाई पर 87.5 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली विश्व धरोहर फूलों की घाटी की सैर कर सकेंगे। बेस कैम्प घांघरिया के पास स्थित घाटी का प्रवेश द्वार सुबह आठ बजे खोला जाएगा। शुरुआती दिनों में घाटी की सैर के दौरान पर्यटकों को लेगी नाले में हिमखंड के साथ 20 से अधिक हिमालयी प्रजाति के रंग-बिरंगे फूलों का दीदार होगा। फिलहाल घाटी की सैर के लिए आफलाइन पंजीकरण ही किए जा रहे हैं। रविवार को लगभग दो दर्जन पर्यटक घाटी के बेस कैंप घांघरिया पहुंच चुके थे। सभी सुबह घाटी के लिए रवाना होंगे।

फूलों की घाटी एक जून से 31 अक्टूबर को पर्यटकों के लिए खुली रहती है। यहां जैव विविधता का अनमोल खजाना बिखरा हुआ है। 500 से अधिक रंग-बिरंगे फूलों
के साथ यह घाटी दुर्लभ वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास भी है। यहां आप हिमालयन थार, कस्तूरा मृग, हिम तेंदुआ, हिमालयन काला भालू, भूरा भालू, भरल (नीली भेड़), लाल लोमड़ी, पीला नेवला, उड़न गिलहरी सहित अन्य वन्य जीवों का दीदार कर सकते हैं। घाटी की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह हर 15 दिन में रंग बदलती है। दरअसल, घाटी में 15 दिन के अंतराल में अलग-अलग प्रजाति के फूल खिलते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है, जैसे घाटी में नए रंग का आवरण ओढ़ लिया है। पुष्पवती नदी घाटी के सौंदर्य में चार चांद लगाती है। आप छककर इसका शुद्ध पानी पी सकते हैं।

ऐसे पहुंचें घाटी की सैर को
फूलों की घाटी जाने के लिए बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर गोविंदघाट पहुंचना पड़ता है। गोविंदघाट से तीन किमी आगे पुलना तक शटल सेवा की सुविधा है। इसके बाद घांघरिया तक 10 किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। यहां से फूलों की घाटी तीन किमी की दूरी पर है।

रात रुकने की अनुमति नहीं
घाटी में रात रुकने की अनुमति नहीं है, इसलिए पर्यटकों को हर हाल में शाम पांच बजे तक वापस घांघरिया लौटना पड़ता है। रास्ते में कोई दुकान न होने के कारण पर्यटकों को भोजन व अन्य जरूरी सामग्री भी साथ ले जानी पड़ती है। फूलों के पांच किमी क्षेत्र में ही पर्यटकों को घूमने की अनुमति है।
अभी हो रहा इन फूलों का दीदार
प्रिमुला डेंटिकुलाटा, पोटेंटिला एट्रो सेंगुइनिया, रोडोडेंड्रोन कैम्पैन्युलेटम, रोडोडेंड्रोन लेपिडोटम, थाइमस (वन आजवाइन), कोबरा लिली (अरिसेमा), स्नेक लिली, कोरिडालिस काश्मीरियाना, आइरिस कुमाऊंनेनसिस, एलियम ह्यूमाइल, फ्रिटिलेरिया रायली, वायोला बाइफ्लोरा, जैस्मिनम ह्यूमाइल, मार्श मैरी गोल्ड, सिरिंगा इमोडी, थर्मोप्सिस बारबाटा, लिलियम आक्सीपेटलम, एनीमोन रतनजोत व अर्नेबिया बेंथमी।
वनस्पति शास्त्री फ्रैंक स्माइथ ने की थी फूलों की इस जन्नत की खोज
फूलों की घाटी की खोज वर्ष 1931 में कामेट पर्वतारोहण के लिए गए ब्रिटिश पर्वतारोही एवं वनस्पति शास्त्री फ्रैंक स्माइथ ने की थी। बताते हैं कि कामेट पर्वत से लौटते हुए वह रास्ता भटककर इस घाटी में पहुंच गए। यहां फूलों के इंद्रधनुषी संसार देख वे इस कदर सम्मोहित हुए कि वर्ष 1937 में फिर घाटी की सैर पर आए। वतन वापसी के बाद वर्ष 1938 में उन्होंने ‘वैली आफ फ्लावर’ नाम से एक पुस्तक लिखी, जिसने इस घाटी से देश-दुनिया को परिचित कराया। घाटी को वर्ष 1982 में राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया और वर्ष 2005 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया।





