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लोक के हाथ में पहुंची मधुरवादिनी तिवारी की गढ़वाली काव्यकृति ‘वींणा मा देख्यां स्वीणा’, नवप्रकाशित पुस्तक का दून में हुआ लोकार्पण

Madhuravadini Tiwari's Garhwali poetry work 'Veena Ma Dekhyaan Sweena' reached the hands of the people, the newly published book was released in Doon

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लोक के हाथ में पहुंची मधुरवादिनी तिवारी की गढ़वाली काव्यकृति ‘वींणा मा देख्यां स्वीणा’, नवप्रकाशित पुस्तक का दून में हुआ लोकार्पण

  • कवयित्री ने अपने इस पहले काव्य संग्रह में किया है विलुप्त होते गढ़वाली शब्दों को संरक्षित करने का भी प्रयास, नई पीढ़ी के लिए विरासत हैं ये शब्द

  • वक्ताओं की नई पीढ़ी से गढ़वाली भाषा को न छोड़ने की अपील, कहा- आने वाले समय में हमें भाषाई तौर पर विपन्न बना देगी मातृभाषा की उपेक्षा

देहरादून, 02 जून 2026: कवयित्री मधुरवादिनी तिवारी के नवप्रकाशित पहले गढ़वाली काव्य संग्रह ‘वींणा मा देख्यां स्वीणा’ का मंगलवार को अस्थायी राजधानी के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर वक्ताओं ने गढ़वाली भाषा और संस्कृति को सहेजने के लिए साहित्यिक रचनाकर्म जारी रखने पर जोर दिया। काव्यांश प्रकाशन ऋषिकेश की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक  में मधुरवादिनी ने रचनाओं के माध्यम से विलुप्त होते गढ़वाली शब्दों को संरक्षित करने का भी प्रयास किया है, जो नई पीढ़ी के लिए विरासत हैं।

काव्य संग्रह का लोकार्पण एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल गणी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सोमवारी लाल उनियाल, पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, सुमित्रा जुगलान व बीना बेंजवाल ने किया। इस अवसर पर पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने समाज के लिए संस्कृति और प्रकृति दोनों को बचाने की जरूरत बताई। वरिष्ठ पत्रकार सोमवारी लाल उनियाल ने कविता संग्रह के शीर्षक को यथार्थ के दर्शन कराने वाला बताया। साथ ही कवयित्री को निरन्तर लिखते रहने की सलाह दी।

कवयित्री बीना बेंजवाल ने कहा कि यह पुस्तक मुख्य रूप से स्त्री विमर्श और स्त्री चेतना की कविताओं पर केंद्रित है। कांता घिल्डियाल ने कहा कि मधुरवादिनी की रचनाओं में आए ठेठ गढ़वाली शब्द प्रमाण हैं कि कवयित्री ने अपने गांव एवं अपनी थाती को नहीं छोड़ा। लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल गणी ने कहा कि मधुरवादिनी की साहित्यिक सक्रियता के फलस्वरूप उनकी रचनाओं में परिपक्वता दिख रही है। साथ ही गढ़वाली भाषा को न छोड़ने की अपील करते हुए कहा कि मातृभाषा की उपेक्षा आने वाले समय में हमें भाषाई तौर पर विपन्न बना देगी।

कार्यक्रम में कविता मैठाणी भट्ट ने मधुर वादिनी की एक रचना ’मायादार आंख्यू मा माया लुकाईं च… का पाठ किया। विपुल तिवारी, ज्योत्सना जोशी, उपासना, चंडीप्रसाद तिवारी, रजत पांडे ने भी अपने विचार साझा किए। अमूमन ऐसे आयोजन कम होते हैं, जिसकी गवाह चार पीढियां बनें। लेकिन, इस कार्यक्रम में कवयित्री मधुरवादिनी की मां भी विशेष रूप से उपस्थित रहीं और उन्होंने सभी का आभार भी व्यक्त किया।

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