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वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जनभागीदारी जरूरी 

Sensitivity towards nature and public participation are essential for wildlife conservation.

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वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जनभागीदारी जरूरी

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में वाइल्ड लाइफ प्रिजर्वेशन सोसाइटी की वन्यजीव फोटोग्राफी प्रदर्शनी का शुभारंभ, ‘भारत में वन्यजीव संरक्षण : अतीत से वर्तमान तक और मौजूदा चुनौतियां’ विषय पर विशेष व्याख्यान भी हुआ आयोजित

देहरादून,  1 अक्टूबर, 2026: दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में गुरुवार से वाइल्ड लाइफ प्रिजर्वेशन सोसाइटी (डब्ल्यूपीएस), देहरादून की वन्यजीव फोटोग्राफी प्रदर्शनी का शुभारंभ हो गया, जो सात अक्टूबर तक चलेगी। इस अवसर पर भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. धनंजय मोहन ने ‘भारत में वन्यजीव संरक्षण : अतीत से वर्तमान तक और मौजूदा चुनौतियां’ विषय पर विशेष व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों, प्रकृति प्रेमियों, फोटोग्राफरों, पर्यावरण के प्रति जागरूक नागरिकों, पुस्तकालय के पाठकों और अन्य आमंत्रित अतिथियों ने सहभागिता की।

प्रदर्शनी का आयोजन वन्यजीवों, प्राकृतिक परिवेश और जैव विविधता के प्रति जनसामान्य में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया है। इसमें वाइल्ड लाइफ प्रिजर्वेशन सोसाइटी के सदस्यों द्वारा खींचे गए वन्यजीवों के आकर्षक एवं विविधतापूर्ण छायाचित्र प्रदर्शित किए गए हैं। इन छायाचित्रों के माध्यम से भारत के समृद्ध वन्यजीवन, विभिन्न प्रजातियों के प्राकृतिक व्यवहार, उनके आवास और प्रकृति के साथ उनके संबंधों को देखने का अवसर मिला। प्रदर्शनी में वन्यजीवों की सुंदरता के साथ-साथ उनके सामने उपस्थित पर्यावरणीय चुनौतियों और उनके संरक्षण की आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया।

अपने व्याख्यान में डॉ. धनंजय मोहन ने भारत में वन्यजीव संरक्षण की ऐतिहासिक यात्रा, इसके बदलते स्वरूप और वर्तमान समय में सामने आ रही चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वन्यजीव संरक्षण की अवधारणा केवल वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने या कुछ प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र, प्राकृतिक आवासों और जैव विविधता के संरक्षण से जुड़ा व्यापक विषय है। भारत में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में समय के साथ विकसित हुई नीतियों, संस्थागत प्रयासों और सामाजिक जागरूकता ने इस क्षेत्र को एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया है।

डॉ. मोहन ने मनुष्य और वन्यजीवों के बीच बदलते संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में संरक्षण के प्रयासों को स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं और प्राकृतिक संसाधनों पर उनकी निर्भरता को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाना आवश्यक है। वन क्षेत्रों और प्राकृतिक आवासों पर बढ़ते दबाव, भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा मानवीय गतिविधियों के विस्तार से वन्यजीवों के जीवन और उनके प्राकृतिक परिवेश पर प्रभाव पड़ता है। ऐसे में संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अध्ययन, प्रभावी प्रबंधन, नीतिगत प्रतिबद्धता और समाज की सक्रिय भागीदारी के बीच समन्वय जरूरी है।

उन्होंने इस बात पर भी ध्यान आकर्षित किया कि वन्यजीव संरक्षण को केवल सरकारी विभागों या विशेषज्ञ संस्थाओं की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं है। आम नागरिकों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, प्रकृति प्रेमियों और स्थानीय समुदायों की सहभागिता से ही संरक्षण संबंधी प्रयासों को व्यापक सामाजिक आधार मिल सकता है। प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना, वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को समझना और उनके आवासों के महत्व को पहचानना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

व्याख्यान के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में उपस्थित लोगों ने वन्यजीव संरक्षण, मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व, प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा, जैव विविधता और संरक्षण संबंधी जनजागरूकता जैसे विषयों पर सवाल पूछे। डॉ. मोहन ने प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं को शांत करते हुए संरक्षण के व्यावहारिक पक्षों और वर्तमान चुनौतियों के संदर्भ में विचार साझा किए। संवाद के दौरान इस बात पर विशेष चर्चा हुई कि विकास संबंधी गतिविधियों और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक समझ और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों आवश्यक हैं।

कार्यक्रम में वाइल्डलाइफ प्रिजर्वेशन सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने संस्था की गतिविधियों और वन्यजीव संरक्षण के प्रति उसकी दीर्घकालीन प्रतिबद्धता की जानकारी दी। सोसाइटी देहरादून की उन पुरानी संस्थाओं में शामिल है, जो वन्यजीवों और प्राकृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। संस्था की ओर से आयोजित यह प्रदर्शनी भी इसी उद्देश्य का हिस्सा है। इसके माध्यम से वन्यजीव फोटोग्राफी को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति को समझने और संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने के एक प्रभावी माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम ने पुस्तकालय की शैक्षिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संवाद की भूमिका को भी रेखांकित किया। यहां आयोजित प्रदर्शनी और व्याख्यान के माध्यम से विद्यार्थियों, पाठकों तथा आम नागरिकों को वन्यजीव संरक्षण के विविध पहलुओं से परिचित होने का अवसर मिला। प्रदर्शनी में प्रवेश निःशुल्क है।

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