ग्लेशियर झीलों पर अब रियल टाइम नजर, बढ़ेंगे अर्ली वार्निंग सिस्टम
उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील, चार का सर्वे पूरा, केदारताल और सरस्वती ताल का जल्द होगा वैज्ञानिक सर्वेक्षण

देहरादून, 29 अगस्त 2026: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरे को देखते हुए सरकार ने निगरानी और आपदा प्रबंधन व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित वैज्ञानिक निगरानी के साथ अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाएंगे। जरूरत के अनुसार इनकी संख्या भी बढ़ाई जाएगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन को प्रदेश की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन कराने के निर्देश दिए हैं।
प्रदेश में 13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित की गई हैं। इनमें से चार का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है, जबकि बाकी झीलों का चरणबद्ध तरीके से सर्वे कराया जाएगा। जल्द ही चमोली की सरस्वती ताल और उत्तरकाशी की केदारताल के सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल रवाना होगा। सर्वे में झीलों के जलस्तर, आकार में बदलाव, आसपास के भू-भाग की स्थिति और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव का आकलन किया जाएगा।
सेंसर से मिलेगी पल-पल की जानकारी
संभावित खतरे का समय रहते पता लगाने के लिए ग्लेशियर झीलों पर आधुनिक सेंसर और जलस्तर मापक उपकरण लगाए जाएंगे। इनके जरिये रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था की जाएगी। झील के जलस्तर या आकार में असामान्य बदलाव होने पर समय रहते संबंधित क्षेत्रों को चेतावनी दी जा सकेगी। संचार व्यवस्था और अर्ली वार्निंग उपकरणों को भी जरूरत के अनुसार बढ़ाया जाएगा।
जोखिम वाले क्षेत्रों में निकासी मार्ग होंगे चिह्नित
संभावित आपदा की स्थिति में प्रभावित आबादी को सुरक्षित निकालने के लिए निकासी मार्गों को चिह्नित किया जाएगा। जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान के साथ वैकल्पिक संचार माध्यम, स्थानीय चेतावनी तंत्र और राहत-बचाव की तैयारियों को भी मजबूत किया जाएगा।
नेपाल की आपदा से लिया सबक
मुख्यमंत्री के निर्देश पर नेपाल में हाल में हुई आपदा के बाद उत्तराखंड में संभावित आपदाओं से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की गई। राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग के उपाध्यक्ष विनय रुहेला और ले. कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने जिलाधिकारियों के साथ बैठक कर ग्लेशियर झीलों, नदियों के जलस्तर, संवेदनशील स्थलों, अर्ली वार्निंग सिस्टम और संचार व्यवस्था की स्थिति जानी। जिलाधिकारियों को जोखिम वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी करने और किसी भी असामान्य गतिविधि की सूचना तत्काल उच्च स्तर पर देने के निर्देश दिए गए।
डैम-बैराज से पानी छोड़े जाने पर भी होगा अलर्ट
विनय रुहेला ने कहा कि उत्तराखंड और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां काफी हद तक समान हैं। नेपाल की आपदा से सीख लेते हुए संभावित जोखिमों के लिए पहले से तैयारी जरूरी है। उन्होंने डैम और बैराज प्रबंधकों के साथ नियमित बैठक करने और पानी छोड़े जाने की स्थिति में निचले क्षेत्रों की आबादी को समय रहते अलर्ट करने के निर्देश दिए।
गांव तक पहुंचेगी आपदा की सूचना
ले. कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी ने कहा कि आपदा के समय स्थानीय लोगों और प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। ग्राम प्रधानों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ मजबूत और त्वरित संचार नेटवर्क विकसित किया जाना जरूरी है, ताकि आपात स्थिति में चेतावनी सबसे पहले प्रभावित लोगों तक पहुंच सके। संवेदनशील क्षेत्रों के लोगों को संभावित खतरों और आपदा के दौरान अपनाई जाने वाली सुरक्षित प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक करने पर भी जोर दिया जा रहा है।



