अतिवृष्टिआपदाआपदा प्रबंधनउत्तराखंडऑफबीटदुर्घटनामानसून

कुपड़ा गाड में बना हुआ है जान का जोखिम, जैसे-तैसे रस्सी के सहारे नदी को पार कर रहे ग्रामीण

There is a risk to life in Kupada Gad, villagers are somehow crossing the river with the help of rope.

खबर को सुनें


कुपड़ा गाड में बना हुआ है जान का जोखिम, जैसे-तैसे रस्सी के सहारे नदी को पार कर रहे ग्रामीण

यमुनोत्री राजमार्ग पर सिलाई बैंड क्षेत्र में कुपड़ा गाड पर पुल न होने से ग्रामीणों को हो रही परेशानी, नदी को पार करने के लिए रस्सी का सहारा, नदी का जलस्तर बढ़ने पर खतरे में पड़ सकता है जीवन

देहरादून, 05 अगस्तर 2026:  उत्तरकाशी जिले के स्यानाचट्टी में लंबे प्रयासों के बाद यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात बहाल हो गया, लेकिन सिलाई बैंड क्षेत्र में सफर अभी भी जोखिमभरा बना हुआ है। इससे कुपड़ा, कुंसाला और त्रिखली गांव के लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कुपड़ा गाड पर पुल का निर्माण कार्य पूरा न होने से ग्रामीण जान जोखिम में डालकर रस्सी के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं।

कुपड़ा गाड पर पुल न होने के कारण कई गांवों का संपर्क बाधित है। ऐसे में लोग आवश्यक कार्यों के लिए नदी पार करने को रस्सी का सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति किसी बड़े हादसे की आशंका को जन्म दे रही है। फिलहाल वर्षा का दौर कम होने पर जैसे-जैसे आवाजाही हो रही है, लेकिन यदि वर्षा का सिलसिला तेज हुआ तो नदी का जलस्तर बढ़ने से जीवन खतरे में पड़ सकता है।

स्थानीय निवासी हिमांशु, विक्की, जयपाल आदि ने बताया कि रस्सी के सहारे कुपड़ा गाड पार करना बेहद खतरनाक है। इससे महिला, बुजुर्ग व स्कूली बच्चों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है और नदी का जलस्तर बढ़ने पर कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि कुपड़ा गाड पर पुल निर्माण कार्य में तेजी लाई जाए और तब तक सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, ताकि लोगों को रस्सी के सहारे नदी पार करने से राहत मिल सके।

Global Ganga News

साथियों, Globalganga.com के मंच पर आपका स्वागत करते हुए हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है, जब हम भी वेब पोर्टल की भीड़ में शामिल होने जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ कि भीड़ का हिस्सा होते हुए भी हमेशा भीड़ से अलग दिखने का प्रयास करेंगे। हम चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं का देश-दुनिया में प्रसार हो, उत्तराखंड की बोली-भाषाएं समृद्ध हों और उन्हें स्वतंत्र पहचान मिले, यहां आध्यात्मिक पर्यटन एवं तीर्थाटन का विकास हो …और सबसे अहम बात यह कि इस सब में हमारी भी कुछ न कुछ भागीदारी अवश्य रहे। साथ ही एक विनम्र आग्रह भी है कि अपने कीमती सुझावों से समय-समय पर अवगत कराते रहें। ताकि सुधार की प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहे। अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि हम एक-दूसरे पर भरोसा बनाये रखें। यही भरोसा समाज में संवाद की बुनियाद मजबूत करने का आधार बनेगा। इन्हीं शब्दों के साथ आइये! कामना करें कि- ‘सबके हृदय में सर्वदा संवेदना की दाह हो, हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो। -संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button