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श्रद्धालुओं के लिए खुले विश्व के सबसे ऊंचे गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब के कपाट

The doors of the world's highest Gurdwara Hemkund Sahib opened for devotees

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श्रद्धालुओं के लिए खुले विश्व के सबसे ऊंचे गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब के कपाट

पहले दिन 6,605 श्रद्धालुओं ने टेका गुरुद्वारा साहिब में मत्था, दंडी पुष्कर्णी तीर्थ लोकपाल लक्ष्मण मंदिर में भी की पूजा-अर्चना, हेमकुंड साहिब तक बर्फ काटकर रास्ता बनाने वाले सेवा के जवानों व गुरुद्वारा के सेवादारों का सरोपा भेंटकर किया गया सम्मान

देहरादून, 23 मई 2026: चमोली जिले की भ्यूंडार घाटी में समुद्रतल से 15,225 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित विश्व के सबसे ऊंचे गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब के कपाट शनिवार को अरदास, शबद-कीर्तन व हुक्मनामा लेने के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। इस मौके पर देश के विभिन्न हिस्सों से आए 6,605 श्रद्धालुओं ने पवित्र सरोवर में स्नान कर गुरुद्वारा साहिब में मत्था टेका। कपाट खुलने के अवसर पर हेमकुंड तक बर्फ काटकर रास्ता बनाने वाले सेना के जवानों और गुरुद्वारा के सेवादारों को सरोपा भेंट कर सम्मानित भी किया गया। श्रद्धालुओं ने हेमकुंड परिसर में स्थित दंडी पुष्कर्णी तीर्थ लोकपाल लक्ष्मण मंदिर में भी दर्शन कर पूजा-अर्चना की ।

गुरुद्वारा साहिब के कपाट खोलने की प्रक्रिया सुबह शुरू हो गई थी। सुबह नौ बजे पंज प्यारों की अगुआई में बेस कैंप घांघरिया से चला श्रद्धालुओं का पहला जत्था हेमकुंड साहिब पहुंचा। इसके बाद मुख्य ग्रंथी सरदार सुच्चा सिंह व सरदार हमीर सिंह ने धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया। सुबह दस बजे गुरुद्वारा साहिब के कपाट खोलने के बाद श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सचखंड साहिब से लाकर दरबार साहिब में सुशोभित किया गया और फिर सुखमणी साहिब का पाठ हुआ। शबद-कीर्तन के पश्चात इस साल की पहली एवं एकमात्र अरदास हुई। धाम में निशान साहिब स्थापित करने के साथ हुक्मनामा लेकर हेमकुंड साहिब की यात्रा विधिवत शुरू हो गई।

गुरुद्वारा श्री हेमकुंड साहिब मैनेजमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन नरेंद्र जीत सिंह बिंद्रा ने बताया कि धाम की यात्रा शुरू होने के साथ अब तक सुनसान पड़ी घाटी ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के जयकारे से गुंजायमान हो उठी है। कपाट खुलने के अवसर पर ट्रस्ट के सीईओ सरदार सेवा सिंह समेत सेना के जवान और बड़ी संख्या में गुरुद्वारा के सेवादार मौजूद रहे।

भ्यूंडार निवासी नत्था सिंह चौहान थे गुरुद्वारा साहिब के पहले ग्रंथी

हेमकुंड साहिब की खोज वर्ष 1934 में हुई थी। क्षेत्र के इतिहासकार एवं पर्यटन विशेषज्ञ पूर्व मंत्री केदार सिंह फोनिया की पुस्तक ‘डिवाइन हेरिटेज आफ हेमकुंड साहिब एंड वर्ल्ड हेरिटेज आफ वैली आफ फ्लावर’ के मुताबिक वर्ष 1930 के दशक में पत्रकार तारा सिंह नरोत्तम बदरीनाथ यात्रा पर आए थे। उन्होंने पांडुकेश्वर से यहां जाकर इसकी खोज की और अपने लेखों के माध्यम से पंजाब के निवासियों को हेमकुंड साहिब के बारे में बताया। वर्ष 1934 में सेना के हवलदार मोदन सिंह ने यहां आकर गुरुवाणी में लिखी पंक्तियों से इस तीर्थ का
मिलान किया। वर्ष 1937 में हेमकुंड की यात्रा शुरू हुई। ट्रस्ट के सीईओ सरदार सेवा सिंह ने बताया कि हेमकुंड साहिब में गुरुद्वारा साहिब की स्थापना वर्ष 1936 में हुई, जबकि वर्ष 1937 में गुरु ग्रंथ साहिब की पहली अरदास हुई थी। धाम के पहले ग्रंथी भ्यूंडार निवासी नत्था सिंह चौहान थे। वह तीन दशक तक इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे।

तन को सुकून और मन को शांति का एहसास कराती है हेमकुंड साहिब की यात्रा

हेमकुंड साहिब पहुंचने के लिए पुलना से 16 किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। यह यात्रा बेहद दुर्गम है और धाम में श्रद्धालुओं के रात्रि विश्राम का कोई इंतजाम नहीं है। लिहाजा, दोपहर दो बजे बाद श्रद्धालुओं को हर हाल में धाम के बेस कैम्प घांघरिया के लिए वापसी करनी पड़ती है। वर्तमान में जब लोग मैदानी इलाकों की
चिलचिलाती गर्मी से बेहाल हैं, तब बर्फ के बीच अटलाकोटी से हेमकुंड तक की यात्रा तन को सुकून और मन को शांति प्रदान करती है। हेमकुंड में भी चारों ओर बर्फ की चादर बिछी हुई है और सरोवर भी बर्फ से लकदक है।

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