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सावन में फूलों की घाटी को महका रही ब्रह्मकमल की खुशबू

The fragrance of Brahma Kamal is making the valley of flowers fragrant in the month of Sawan.

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सावन में फूलों की घाटी को महका रही ब्रह्मकमल की खुशबू

सावन में देव पुष्प ब्रह्मकमल से किया जाता है पंच केदार धाम में भगवान शिव का अभिषेक, फूलों की घाटी की नम और पथरीली ढलानों पर ब्लू पापी का फूल भी बिखेर रहा है रंगत

देहरादून, 02 अगस्त 2026: चमोली जिले में समुद्रतल से 12,995 फ़ीट की ऊंचाई पर 87.5 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली विश्व धरोहर फूलों की घाटी का कुंठखाल क्षेत्र और हेमकुंड-लोकपाल घाटी इन दिन दिनों देवपुष्प ब्रह्मकमल की खुशबू से महक रही है। इसके अलावा घाटी की नम और पथरीली ढलानों पर ब्लू पॉपी के फूलों की आभा भी देखते ही बनती है। अपने चमकीले नीले रंग के कारण ब्लू पॉपी को ‘हिमालयी फूलों की रानी’ भी कहा जाता है।

समुद्रतल से चार हजार से अधिक की ऊंचाई पर खिलने वाले देव पुष्प ब्रह्मकमल को उत्तराखंड के राज्य पुष्प का दर्जा हासिल है। सावन में इसी दुर्लभ पुष्प से पंच केदार धाम में भगवान शिव की पूजा होती है। नंदा अष्टमी पर उत्तराखंड की लोक देवी नंदा का अभिषेक भी इसी फूल से किया जाता है। इन दिनों यह पुष्प उत्तराखंड में फूलों की घाटी, हेमकुंड-लोकपाल घाटी में आस्था व सप्तशृंग शिखर की तलहटी, पंच केदार, पांगर चुला, भनाई, नंदी कुंड, नीलकंठ, कागभुशंडी, चेनाप फूलों की घाटी, सतोपंथ, डयाली सेरा, ऋषिकुंड, सहस्र ताल और रुद्रनाथ के बुग्याली क्षेत्र में जुलाई-अगस्त के दौरान अपनी रंगत बिखेरता है। यही वजह है कि इन दिनों हेमकुंड साहिब ट्रेक पर खिले ब्रह्मकमल के फूल पर्यटकों के कदम ठिठका दे रहे हैं। हेमकुंड सरोवर के ऊपर भी प्राकृतिक क्यारियों में ब्रह्मकमल के फूल महक बिखेर रहे हैं।

लोक की अधिष्ठात्री नंदा का प्रिय पुष्प है ब्रह्मकमल

ब्रह्मकमल लोक देवी नंदा का प्रिय पुष्प हैं, इसलिए चमोली जनपद में  हर वर्ष नंदा देवी लोकजात और 12 साल बाद नंदा देवी राजजात के दौरान नंदा अष्टमी पर्व पर इसे विशेष रूप से तोड़े जाने की परंपरा है। इस दौरान कुछ सेवादार (देव फुलहारी) उच्च हिमालयी क्षेत्र व बुग्यालों की कठिन यात्रा कर देवी नंदा को अर्पित करने के लिए ब्रह्मकमल लाते हैं।

वर्जित एवं प्रतिबंधित है ब्रह्मकमल को तोड़ना

 

उच्च हिमालयी क्षेत्र में राज्य पुष्प ब्रह्मकमल को तोड़ना वर्जित एवं प्रतिबंधित माना जाता है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं और पारिस्थितिकीय कारण दोनों हैं। इसलिए पूजा के लिए भी इसे विशेष अनुमति या विधि-विधान पूर्वक ही तोड़ा जाता है। दरअसल, अत्याधिक दोहन , जलवायु परिवर्तन और पर्यटकों द्वारा फैलाई जा रही गंदगी के कारण ब्रह्मकमल की की संख्या लगातार घटती जा रही है। इसलिए इसका संरक्षण बेहद जरूरी है।

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