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आओ! विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे हम्पी चलें, जानें उसके उत्कर्ष से अपकर्ष तक की गाथा

Come! Let's visit Hampi, the capital of the Vijayanagara Empire, and learn about its story from its rise to decline

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आओ! विजयनगर साम्राज्य की राजधानी रहे हम्पी चलें, जानें उसके उत्कर्ष से अपकर्ष तक की गाथा

 

वरिष्ठ साहित्यकार तापस चक्रवर्ती की पुस्तक ‘हम्पी : उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ का लोकार्पण, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में हुआ कार्यक्रम

देहरादून, 4 अप्रैल, 2026:  दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार तापस चक्रवर्ती की पुस्तक ‘हम्पी : उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान पुस्तक पर परिचर्चा भी हुई। तापस की यह पुस्तक वर्ष 2025 के ‘वैली ऑफ़ वर्ड्स’ के नॉन फिक्शन वर्ग में शार्ट लिस्ट हो चुकी है। इसके अलावा पुस्तक के लिए तापस को कादंबरी संस्था, जबलपुर की ओर से नवम्बर 2025 में ‘साहित्य सरस्वती’ सम्मान और दिसम्बर 2025 में लिटरेचरलाइट पब्लिशिंग की ओर से एशिया का प्रतिष्ठित ‘स्पर्श’ साहित्य सम्मान प्रदान किया जा चुका है।

जीते-जागते नगर हम्पी की झलक दिखाती है पुस्तक

लोकार्पण कार्यक्रम में दून विश्वविद्यालय की कुलपति डा. सुरेखा डंगवाल ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। जबकि उत्तराखंड साहित्य भूषण से सम्मानित ख्यातिप्राप्त कहानीकार डा. जितेन ठाकुर और वरिष्ठ साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने परिचर्चा में भाग लिया। उन्होंने कहा कि एक जीते-जागते नगर हम्पी के बारे में लिखी यह पुस्तक विशाल विजयनगर साम्राज्य की राजधानी की एक झलक देने का प्रयास करती है। लगता है पाठक इसे पढ़ते हुए उसी जगह की सैर कर रहा है। वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डा .बुद्धिनाथ मिश्र ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के चन्द्रशेखर तिवारी ने सभी वक्ताओं व उपस्थित बुद्धिजीवियों का धन्यवाद किया। संचालन डॉ. भारती मिश्र ने किया।

अर्श से फर्श तक का सिलसिलेवार इतिहास

पुस्तक बताती है कि चौदहवीं सदी में कैसे एक नगर अपनी ख्याति एवं वैभव के कारण सम्पूर्ण विश्व में एक अनूठा स्थान बनाते हुए उत्कर्ष तक पंहुचा। कैसे सोलहवीं सदी के मध्य में एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक तालीकोटा के युद्ध में पराजित हुआ और अपने अपकर्ष से जा मिला। पुस्तक में विजयनगर से हम्पी तक का संक्षिप्त इतिहास, शासकों का परिचय एवं उनके शासन की उल्लेखनीय दास्तान, तत्कालीन विदेशी यात्रियों के विवरण, बोलते खंडहरों की गाथाएं, उनके निर्माण का विवरण एवं इन जीवंत पत्थरों की भाषा, विजय विट्ठल से वीरुपाक्ष मंदिरों का महत्व, महलों एवं अन्य राजसी इमारतों का विवरण, तत्कालीन धर्म एवं संप्रदाय की स्थिति आदि का उल्लेख हुआ है। लेखक तापस चक्रवर्ती हाल ही में केन्द्रीय जीएसटी विभाग से सहायक आयुक्त के पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। उनके अब तक पांच यात्रा वृतान्त प्रकाशित हो चुके हैं।

कार्यक्रम में रूपा चक्रवर्ती, आनिल भारती, रजनीश त्रिवेदी, इंदरजीत सिंह, सोमवारी लाल उनियाल, प्रो. गोविन्द सिंह, डॉ. सुशील उपाध्याय, डॉ.दिनेश शर्मा, डॉ. डीके पाण्डे, देवेन्द्र कुमार काण्डपाल, दर्द गढ़वाली, भारत सिंह रावत, समदर्शी बड़थ्वाल, शैलेंद्र नौटियाल, कर्नल मदन मोहन कण्डवाल, कीर्ति नवानी, सुंदर सिंह बिष्ट, भगवान प्रसाद घिल्डियाल, कुलभूषण नैथानी आदि साहित्यकार, भाषाविद, शोध छात्र व युवा पाठक उपस्थित रहे।

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