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106 साल की विरासत को संजोएगी पौड़ी की ऐतिहासिक जेल      

Pauri's historical jail will preserve the heritage of 106 years

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106 साल की विरासत को संजोएगी पौड़ी की ऐतिहासिक जेल

वर्ष 1902 में बनी पौड़ी जेल को संग्रहालय के रूप में विकसित करने की तैयारी, 1.77 करोड़ की लागत से शुरू हुआ निर्माण कार्य, स्वतंत्रता संग्राम, कुली बेगार और उत्तराखंड आंदोलन की यादें होंगी संरक्षित, पहली किस्त के रूप में जारी हुई 37.89 लाख की राशि, एक वर्ष में पूरा हो जाएगा काम

देहरादून, 7 जुलाई 2026: ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1902 में स्थापित पौड़ी जेल को अब संग्रहालय बनाने की तैयारी है। इसमें जेल के जीवन, श्रम, बैरक, काल कोठरी और कैदियों के जीवन को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। गढ़वाल मंडल की इस पहली जेल के प्रवेश द्वार पर ब्रिटिशकालीन सुरक्षा कर्मियों, जेलर कक्ष में जेलर और उस दौर के अधिवक्ताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित होंगी। संग्रहालय के लिए जिला योजना से  1.77 करोड़ मंजूर होने के बाद 37.89 लाख की पहली किस्त भी जारी हो चुकी है। कार्य पूरा करने के लिए एक वर्ष का लक्ष्य रखा गया है।

वर्ष 2008 में खांड्यूसैंण में नई जिला जेल बनने के बाद पौड़ी जेल को वहां स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके बाद वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने पुराने जेल भवन को संग्रहालय बनाने की घोषणा की थी, जिस पर अब जाकर काम शुरू हुआ है। लगभग 910 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले परिसर में जेलर कक्ष, एक सामूहिक बैरक, दो कैदखाने और दो काल कोठरियां हैं। यह जेल स्वतंत्रता संग्राम, कुली बेगार आंदोलन, गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन, आपातकाल और पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन सहित कई ऐतिहासिक जनांदोलनों की गवाह रही है। बताते हैं कि वर्ष 1921 के असहयोग आंदोलन से लेकर वर्ष 1942 के असहयोग आंदोलन तक करीब 396 राजनीतिक बंदी यहां तीन दिन से दो माह तक कैद रहे। जेल की क्षमता केवल आठ कैदियों की होने के कारण लंबी सजा पाने वाले बंदियों को बाद में बिजनौर, बरेली और लखनऊ भेजा जाता रहा।

जेल में रहे प्रमुख जननायक

इस जेल में पेशावर विद्रोह के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, गोविंद बल्लभ पंत, कप्तान रामप्रसाद नौटियाल, बलदेव सिंह आर्य, भक्त दर्शन, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मंगतराम खंतवाल, बडोला बंधु, वकील कोतवाल सिंह नेगी, भोला दत्त चंदोला, जीवनंद खंडूड़ी, महेशानंद थपलियाल सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानी और जननेता बंदी रहे। उनकी पैरवी बैरिस्टर मुकुंदी लाल और गोविंद बल्लभ पंत जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने की।

इतिहास के आईने में

वर्ष 1815 में गढ़वाल, कुमाऊं कमिश्नरी का हिस्सा हुआ करता था। वर्ष 1839 में गढ़वाल को पृथक जिला बनाया गया और 1840 में पौड़ी को इसका मुख्यालय घोषित किया गया। ब्रिटिश शासन के दौरान बढ़ते जनांदोलनों और कानून-व्यवस्था के मद्देनजर वर्ष 1902 में यहां पहली स्थायी जेल की स्थापना की गई। यह तब गढ़वाल मंडल की पहली जेल थी।

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