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लोकजीवन से जुड़ा है संपूर्ण संस्कृत वाङ्मय  

The entire Sanskrit literature is connected with folk life

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लोकजीवन से जुड़ा है संपूर्ण संस्कृत वाङ्मय

दून पुस्तकालय में साहित्यिक पत्र ‘नवोदित प्रवाह’ के लोक संस्कृति विशेषांक का लोकार्पण करते हुए साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कही यह बात

देहरादून, 11 मार्च 2026: आज के समय में कविताएं लिखने वाले ऐसे कवि दुर्लभ हो गये हैं, जो भाषा में शब्दों को लेकर अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति नये ढंग से कर सकें। यह बात दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में साहित्यिक पत्र ‘नवोदित प्रवाह’ के लोक संस्कृति विशेषांक का लोकार्पण करते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कही। उन्होंने कहा कि सबसे पहले प्राकृत कविताओं का स्मरण इस अंक को देखते ही हो जाता है। पता चल जाता है कि कविता ने अपने कितने बौद्धिक घराने बदले हैं। इस दौरान लोक संस्कृति पर विमर्श भी हुआ।

साहित्यकार जगूड़ी ने कहा कि रजनीश त्रिवेदी द्वारा संपादित इस साहित्यिक विशेषांक में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर तक असोम, अरुणाचल प्रदेश व नागा लोक संस्कृति की प्रस्तुति अत्यंत रोचकता  के साथ हुई है। उत्तराखण्ड के कुमाऊंनी, गढ़वाली व जौनसारी जीवन का स्मरण कराने वाले विवेचन प्रस्तुत किये गये हैं। प्रसिद्ध कुमाऊंनी झोड़ा का संस्कृत भावानुवाद हृदय में समाने वाला है। जगूड़ी ने कहा कि आजकल ऐसी विद्वतापूर्ण पत्रिका का प्रकाशन को वह एक अद्भुत संयोग ही नहीं, बल्कि विलक्षण घटना मानते हैं। पत्रिका में डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी की कविता ‘कोई घर आने वाला है’ देखकर तो उन्हें पूरा अतीत याद आ गया।

उन्होंने कहा कि विशेषांक में पाली साहित्य में लोक संस्कृति से लेकर देश की लगभग सभी भाषाओं के साहित्य की प्रवृत्तियों और रचनाकारों के माध्यम से भारतीय लोक संस्कृति की विवेचना प्रस्तुत की गई है। डॉ सुधा पाण्डे के पाली साहित्य पर लेख को उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बताया और कहा कि यह हमें बौद्ध साहित्य के अंतर्गत त्रिपिटक व थेर गाथाओं में अध्यात्म के साथ-साथ भिक्षु नाग सेन और मिलिंद के संवादों की भी स्मृति दिलाता है।

मुख्य वक्ता साहित्यकार अनिल रतूड़ी ने लोक संस्कृति विशेषांक का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा    कि पत्रिका के इस वार्षिक अंक में लोक संस्कृति से जुड़े  107 साहित्यिक लेख संग्रहित हैं। संपादकीय में लोक संस्कृति, उसके साहित्य, संगीत, चित्रकला और शिल्प के महत्व को रेखांकित किया गया है, जो सदैव उस नींव का कार्य करते हैं, जिससे उच्च सभ्यता का विकास होता है। कहा कि यह अंक भारत जैसे विशाल देश की अनंत रंगीन लोक संस्कृति को समाहित करता है। पत्रिका में जहां एक ओर अरुणाचल, मिजोरम आदि राज्यों की सुदूर आदिवासी संस्कृति पर लेख हैं, वहीं दूसरी ओर इसमें देश के लगभग सभी मुख्य राज्यों की लोक संस्कृति के दिलचस्प पहलुओं को दर्शाने वाले लेख भी शामिल हैं।

रतूड़ी ने कहा कि संपादक ने अवध, भोजपुरी, कन्नौज, मैथिली विदर्भ, मालवा, गढ़वाल, कुमाऊं, जौनसार व रवांई क्षेत्र की लोक संस्कृति को भी पाठकों तक पहुंचाने के लिए इस खंड में स्थान दिया है। देश की अनंत संस्कृतिक विविधता के दृष्टिगत यह कहा जाता है कि समस्त विश्व की विविधता में भारत की ओर से प्रदर्शित अनंत विविधता को व्यक्त करने के लिए कुछ और जोड़ने की आवश्यकता होगी। ​इसे पढ़ना किसी भी पाठक के लिए एक समृद्ध अनुभव होगा।

कवि एवं पत्रकार सोमवारी लाल उनियाल ‘प्रदीप’ ने कहा कि लोक की भावभूमि पर ही भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला और संगीत का उद्भव होता है। लोक से अनुप्राणित होकर ही मानवीय चेतना प्रतिभानुकूल जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रसर होती है। वास्तव में लोक के बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। वर्तमान में हमने जो लोकतंत्र स्वीकार किया, लोक के बिना वह सार्थक ही नहीं हो सकता।

कवि प्रो.राम विनय सिंह ने कहा कि ‘वेद’ मानव जाति के ज्ञानोत्कर्ष से समाविष्ट शास्त्रीयता और पाण्डित्य का प्रशस्त मानक रूप है और ‘लोक’ इससे भिन्न आम जनमानस के उच्चावच भावों की अक्रम अभिव्यक्ति का स्वीकृत संसार है। यही कारण है कि कहीं वेद लोक में स्वीकृत है, तो कहीं लोक ही प्रधानतः मान्य है, लेकिन मानव समाज की चेतना ने इसे दो पृथक परिपाटी के रूप में ग्रहण किया है। लोक के संस्कार, प्रथाएं, खान-पान, पारिवारिक संबंध, वेशभूषा, आभूषण व प्रसाधन के साधन, कलाएं, उत्सव, व्रत, औषधि ज्ञान, आर्थिक उपक्रम, धार्मिक जीवन, परस्पर मानवीय भावनाएं इत्यादि- सब मिलकर लोक और लोक संस्कृति का स्वरूप गढ़ते हैं। निःसंदेह ये सभी तत्व मानवीय स्वरूप और संचेतना के साथ सर्वदा विद्यमान रहते ही रहते हैं। उन्होंने संस्कृत की लोक दृष्टि से लेकर अधुनातन लोकभाषा और बोलियों तक की  लोकयात्रा को अत्यंत प्रभावशाली रूप में दृष्टान्तपूर्वक अभिव्यक्ति दी।

पूर्व कुलपति डॉ. सुधा पांडेय ने कहा कि ‘नवोदित प्रवाह’ का यह विशेषांक लोक संस्कृति के जीवन्त संदेश के संवाद वाहक रूप में पाठकों के लिए अद्भुत लोक के  वैभव के साथ परिचय देने वाला है। इसमें उत्तर से दक्षिण  की लोकयात्रा का साहित्य ही नहीं, लोक के रसरंग से भरा जीवन चैतन्य हो उठा है । लोक भाषाओ से समृद्ध  इस विशेषांक मे भारतीय सांस्कृतिक विरासत और लोक जीवन के अन्यान्य चित्र साकार हुए हैं। लोक का यह रूप तब आत्मा का सगुण स्वरूप बन जाता हैं, जब गीत-नृत्य  जीवन के अंग बनकर लोक के अद्भुत रूप ही नहीं, अपितु मनुष्य मात्र की चेतना को आनंद के रसार्णव में मग्न कर देते हैं।

पूर्व कुलपति ने कहा कि वाचिक परंपरा के वैदिक मंत्रों से आहूत लोक की यह धारा चिरकाल से प्राणिमात्र की रसानंद वर्षण करने वाली अमृत निस्यंदिनी धारा रही है। लोक के साहचर्य में मनुष्य ही नहीं, सारी जड़-चेतन प्रकृति आनंद करती है। कहा कि संस्कृति वह सूत्र है, जो लोक को  बांधकर  रखता है और साहित्य या शास्त्र उस महीन सूत्र का भास्वर रूप है। लोक का यही रूप मानव मन में बसी उस अवचेतन प्रवृत्ति का साक्षी है, जो मिथक के रूप में विभिन्न विधाओं में हर युग की है। यह मिथकीय शक्ति  सामूहिक मन की मान्यताओं  के रूप में हर प्रदेश के  जीवन में छिपी मिलती है।

कहा कि कवि एवं कलाकार की चेतना उसे शब्दायित करके सुर-ताल के साथ पाठकों व दर्शकों के मन में ऊर्जा और आनंद का संचार करती है। इस भावभूमि में पंहुचकर अतीन्द्रिय आनंद की समान अनुभूति सभी भावकों को होती है और इसी अनुभूति की पृष्ठभूमि शास्त्र की जननी बन पाती है। ‘नवोदित  प्रवाह’ का यह अंक सुधी लेखकों  के सहयोग से भारतीय भाषाओ और लोकजीवन के  महत्वपूर्ण तत्वों  के साथ पाठकों के लिए लोकार्पित हुआ है।

पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल ने लोक संस्कृति में लोक संगीत के महत्व का प्रतिपादन किया और कहा कि जो संग रहे वही संगीत है। जो गीत आत्मा से निकलता है, वही सच्चा लोकगीत है। हमें अपने लोक और अपनी मिट्टी से जुड़ना चाहिए। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में  मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने लोक संस्कृति और लोक जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नवोदित प्रवाह का यह अंक उत्तराखण्ड के अलावा देश के विविध क्षेत्र व समाज की आत्मा को गहराई से प्रदर्शित करने में पूरी तरह से सक्षम है। देश के अलग-अलग प्रान्तों की सांस्कृतिक विविधताओं को बहुत ही कुशलता से इस अंक में समेटा गया है।

इससे पूर्व, ‘नवोदित प्रवाह’ के संपादक रजनीश त्रिवेदी ‘आलोक’ ने आगंतुकों का स्वागत किया। संचालन कवयित्री भारती मिश्रा ने किया। केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपलच्याल, कृपा राम नौटियाल, डॉ. पंकज नैथानी, डॉ. दाता राम पुरोहित, डीके कांडपाल, तापस चक्रवर्ती, जयप्रकाश खंकरियाल, सत्यानंद बडोनी, मंजू काला, सोमेश्वर पांडेय, हरि चंद निमेष, सचिन चौहान, श्रद्धा मिश्रा, डॉ. क्षमा कौशिक, कविता बिष्ट, डॉ लालिमा वर्मा, डाॅ. आरपी भारद्वाज, भगवान प्रसाद घिल्डियाल, डॉ. सुदेश ब्याला, डॉ. बैजनाथ, मधुलिका श्रीवास्तव, सुनील त्रिवेदी, सतीश बंसल, दर्द गढ़वाली, केंद्र के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डीके पांडे, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, डॉ. लालता प्रसाद, राकेश कुमार आदि उपस्थित रहे।

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