अंतरराष्ट्रीयअध्यात्मउत्तराखंडजागरूकताप्रेरणाशारदीय नवरात्रशिक्षाशोधसंस्कृतिस्वास्थ्य
यहां तो मुखौटों के पीछे छिपे हुए हैं असंख्य रावण
Here, countless Ravanas are hiding behind masks.

यहां तो मुखौटों के पीछे छिपे हुए हैं असंख्य रावण
दशहरा के बहाने दशानन पर विशेष

रजनी चंदर, 30 सितंबर 2025
देवाधिदेव भगवान शिव के पुरोहित पद पर प्रतिष्ठित, सप्तऋषियों में से एक पुलस्त्य का पौत्र, महापंडित विश्रवा का पुत्र रावण ऋषिकुल में जन्म लेने के बाद भी राक्षस के रूप में ही याद किया जाता है। यह कर्मों की गति ही तो है। आज रावण संज्ञा नहीं, संज्ञेय है, परिभाष्य है। वह मात्र एक पात्र नहीं, चरित्र है। महज स्त्रीहर्ता नहीं, सुसंस्कार द्रोही है। घटना नहीं, परंपरा है और इसीलिए एकल नहीं, बहुल है, सर्वत्र है। घूसखोर, बेईमान, भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी, दंभी, क्रोधी, स्वार्थी, संस्कारहीन, विवेक सुप्त आदि सभी रावण के ही तो प्रतिरूप हैं।
यदि तात्कालिक स्वार्थों में अंधे होकर हम इन रावणों को पहचान नहीं रहे या पहचानते हुए इस ओर आंखें मूंदे हुए हैं तो प्रकारांतर से यह एक और रावण के भ्रूण विकास की सूचना ही तो है। अगर आदमीयत, समाज एवं राष्ट्र की शुचिता की कोई अहमियत हमारे भीतर है तो इन बालिग-नाबालिग व गर्भस्थ रावणों को पहचानने के लिए अपनी क्षमता का विकास करना हमारा नैसर्गिक ही नहीं, नैतिक दायित्व भी है।

रावण नहीं सह सकता सत्य की जीत की उद्घोषणा
‘सत्यमेव जयते’ रावण को नहीं सुहाता। इसमें उसे अपनी मौत दिखती है। चिरस्थायी मौत। कुल का नाश। भविष्य में कोई नामलेवा व पानीदेवा भी न बचे, ऐसा अंत। तब कैसे सह सकता है रावण सत्य की ही जीत की उद्घोषणा। राजनीति रावणी माया जाल का सबसे सुदृढ़ पाया है। इसके बहुत सारे प्रतिरूप हैं। कुछ आधे-अधूरे तो कुछ एक-दूसरे के परिपूरक। विस्तार ही रावण का बीजमंत्र है। भौतिक विस्तार, मानसिक विस्तार। क्योंकि जिस दिन उसके इस स्वच्छंद विस्तार पर कोई अंकुश लगेगा, उसी दिन से उसकी माया छंटनी शुरू होगी, दिग्विजय का सपना टूटेगा। अटल सामाजिक मूल्य फिर स्थापित होना शुरू होंगे।

तीनों लोक में सत्ता हासिल करने का भ्रम पाले है रावण
रावण तो तीनों लोकों की सत्ता हासिल करने का भ्रम पाले बैठा है। अलग-अलग रूप और अपने-अपने दायरे में वह स्वयं को त्रिलोकपति समझने लगा है। इसलिए वह स्वयं को सामाजिक विधानों से ऊपर मानता है। रूढिय़ों को संस्कृति एवं संस्कारों का हिस्सा बताना रावणी कूटनीति का महत्वपूर्ण अंग है। जबकि संस्कृति एवं संस्कार वैमनस्य नहीं पनपाते। वह तो राष्ट्र के जीवन की जड़ें हैं। व्यक्ति पहले समाज और फिर राष्ट्र में बदलता ही संस्कृति एवं संस्कारों के सहारे है। अन्यथा आदिम युग से आज तक की विकास यात्रा कैसे संभव हो पाती। कैसे रावण पर राम की जीत की आशाएं जागतीं।
राम की पूजा, रावण का मोह
हम राम को तो पूजते हैं, लेकिन अंतर्मन में रावण का मोह नहीं टूटता। अपने भीतर पूरी ईमानदारी से झांककर देखें तो महसूस करेंगे कि हमारे दिमाग में यह जो कुछ घुसता-सा जा रहा है, वह हमारे अपने भीतर से उपजा हुआ नहीं है। हमें जो कुछ परोसा गया है और अभी भी परोसा जा रहा है, उसी की उपज है यह।




