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अतीत की परंपरा को भविष्य की तकनीक से जोड़ रहा डाक विभाग

The postal department is combining past traditions with future technology

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अतीत की परंपरा को भविष्य की तकनीक से जोड़ रहा डाक विभाग

विश्व डाक दिवस

देहरादून, 9 अक्टूबर 2025 : एक क्लिक पर संदेश भेजने वाले इस डिजिटल युग में आज भी डाक सेवा अपनी पहचान और प्रासंगिकता बनाए हुए है। कभी घोड़ों, धावकों और कबूतरों के जरिए संदेश पहुंचाने वाली यह व्यवस्था आज आधुनिक तकनीक के साथ फिर से नई उड़ान भर रही है।

हर वर्ष 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है — एक ऐसा दिन जो मानव सभ्यता के सबसे पुराने और भरोसेमंद संचार माध्यम को सलाम करता है। इस दिवस की शुरुआत 1969 में उस ऐतिहासिक घटना की याद में हुई, जब 1874 में स्विट्ज़रलैंड की राजधानी बर्न में ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (UPU)’ की स्थापना की गई थी। भारत 1876 में इसका सदस्य बना, और तब से लेकर आज तक डाक सेवा ने लाखों दिलों को जोड़े रखा है।

ब्रिटेन के सर रोलैंड हिल को डाक सेवा को आम जनता तक पहुंचाने का श्रेय जाता है। उन्होंने 1840 में ‘पेनी पोस्ट प्रणाली’ की शुरुआत की — जहाँ पत्र की दूरी चाहे जितनी भी हो, शुल्क केवल एक पेनी होता था। इसी के साथ दुनिया का पहला डाक टिकट ‘पेनी ब्लैक’ जारी किया गया। यह विचार संचार को लोकतांत्रिक बनाने वाला मील का पत्थर साबित हुआ।

भारत में डाक की परंपरा मौर्य और मुगल काल से चली आ रही है। इंडिया पोस्ट की स्थापना 1 अक्टूबर 1854 को हुई, जिसने आजादी के बाद देश के हर कोने तक अपनी पहुंच बनाई। आज भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क है — जो सिर्फ पत्र नहीं, बल्कि उम्मीद, राहत और सरकारी योजनाओं को भी घर-घर पहुंचा रहा है।

डिजिटल युग में डाक विभाग ने खुद को बदला है। अब यह सिर्फ चिट्ठियों तक सीमित नहीं, बल्कि ई-कॉमर्स, पार्सल डिलीवरी, बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं का अहम हिस्सा बन गया है। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, और ग्रामीण बैंकिंग सुविधाओं ने इसे ‘हर घर बैंक’ के रूप में नई पहचान दी है।

विश्व स्तर पर भी डाक सेवाएँ अब ‘सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर’ बन चुकी हैं — जो वित्तीय समावेशन, डिजिटल पहचान और सामाजिक कल्याण योजनाओं का आधार हैं।

आज का डाक तंत्र केवल संदेश नहीं, बल्कि विश्वास, जुड़ाव और बदलाव की डोर है — जो अतीत की परंपरा को भविष्य की तकनीक से जोड़ रही है।

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