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फुटबॉल के लिए बेच दी जमीन, शून्य से शिखर तक पहुंचे फुटबॉलर विरेन्द्र सिंह रावत

Sold land for football, footballer Virendra Singh Rawat rose from zero to the top

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फुटबॉल के लिए बेच दी जमीन, शून्य से शिखर तक पहुंचे फुटबॉलर विरेन्द्र सिंह रावत

एक दौर में आठ गुणा आठ के कमरे में गुजारा वक़्त, आज फुटबॉल में उत्तराखंड के रोल मॉडल हैं विरेन्द्र

देहरादून, 11 मई 2026: किस्मत की लकीरें इंसान खुद अपनी मेहनत के पसीने से लिखता है, यह उक्ति उत्तराखंड के फ़ुटबॉलर विरेन्द्र सिंह रावत अक्षरशः चरितार्थ होती है। 19 एक्सीडेंट होने के बावजूद सिस्टम की मार झेलने वाले विरेन्द्र ने कभी हार नहीं मानी और आज 57 साल की उम्र में भी वे उसी जोश के साथ राज्य के निर्धन एवं होनहार खिलाड़ियों को तराश रहे हैं। विरेन्द्र के इसी समर्पण ने उन्हें एक प्रतिष्ठित फ़ुटबॉलर के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

14 फरवरी 1970 को पौड़ी गढ़वाल के चौबट्टाखाल ब्लॉक स्थित कुलासु गांव में जन्मे विरेन्द्र के पिता कैप्टन चंद्र सिंह रावत प्रथम गढ़वाल राइफल्स में थे। घर की माली हालत ऐसी थी कि चार भाइयों और एक बहन का पालन-पोषण 10 गुणा 10 के एक कच्चे घर में हुआ। जन्म के समय विरेन्द्र की स्थिति इतनी गंभीर थी कि स्थानीय वैद्य ने हाथ खड़े कर दिए। माता-पिता ने पांच किमी जंगल का रास्ता पैदल तय कर उनका जीवन बचाया। बचपन में ही एक भारी ड्रम गिरने से उनकी अंगुलियां पिचक गईं, जिसका निशान आज भी उनके संघर्ष की गवाही देता है।

गोलकीपर रहे दादा से मिली फुटबॉल खेलने की प्रेरणा

गांव में दूध बेचने और मीलों पैदल चलकर घास लाने का सिलसिला तब थमा, जब उनका परिवार अक्टूबर 1970 में देहरादून के धर्मपुर में शिफ्ट हो गया। यहां एक गोशाला में शरण मिली और आठ गुणा आठ के कमरे में पूरा परिवार सिमटा रहा। विरेन्द्र के दादा शेर सिंह रावत ब्रिटिश गढ़वाल राइफल्स में दिग्गज गोलकीपर थे। उन्हीं की किस्सों ने पांच साल की उम्र में विरेन्द्र के भीतर फुटबॉल का जुनून पैदा किया। अजबपुर कलां के सरकारी स्कूल से शुरू हुआ यह सफर लक्ष्मण विद्यालय और फिर डीएवी इंटर कॉलेज तक पहुंचा।

ट्यूशन पढ़ाने के साथ किताबें बेचकर की गुजर

खेल के प्रति दीवानगी ऐसी थी कि वर्ष 1986 में अंडर-16 और फिर अंडर-19 नेशनल खेला। लेकिन,  भ्रष्टाचार का आलम देखिए कि तत्कालीन सचिव ने उनका नेशनल सर्टिफिकेट किसी अन्य को बेच दिया। फिर भी विरेन्द्र ने कभी हार नहीं मानी। वे 50 रुपये में ट्यूशन पढ़ाते थे, जिसमें से 20 रुपये मां को देते और 20 रुपये बैंक में जमा करते। डीएवी पीजी कॉलेज से बीएससी करने के दौरान उन्होंने क्लर्क की नौकरी की, किताबें बेचीं और बच्चों को कोचिंग भी दी।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन में निभाई सक्रिय भूमिका

विरेन्द्र बताते हैं कि उन्हें सरकारी नौकरी के अवसर भी आए, लेकिन पीडब्ल्यूडी और पोस्ट ऑफिस में घूस मांगी गई, जो उनके पास नहीं थी। ऐसे में हार मानने के बजाय उन्होंने दून स्कूल, आर्यन स्कूल और एशियन स्कूल जैसे संस्थानों में करीब 24 साल तक अकाउंटेंट की नौकरी की। लेकिन, इस सबके बीच खेल का मैदान कभी नहीं छोड़ा। वर्ष 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन में विरेन्द्र  ने सक्रिय भूमिका निभाई। मुजफ्फरनगर कांड के दौरान उन्होंने अपने मित्र रवींद्र सिंह रावत ‘पोलू’ को आंखों के सामने दम तोड़ते देखा और खुद तीन दिन तक गन्ने के खेतों में छिपकर जान बचाई।

2011 में कई देहरादून फुटबॉल एकेडमी की स्थापना

साल 2011 में उन्होंने अपनी पक्की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह फुटबॉल को समर्पित हो गए। उन्होंने देहरादून फुटबॉल एकेडमी (DFA) की स्थापना की। आज अनिरुद्ध थापा जैसे इंटरनेशनल खिलाड़ी उन्हीं की देन हैं। विरेन्द्र बताते हैं कि मुसीबतें फिर भी उनके साथ चलती रहीं और वर्ष 2015 में एक फर्जी स्पॉन्सर ने उनकी एकेडमी पर कब्जा कर उन्हें जेल भिजवा दिया। उस कठिन दौर में  पत्नी गीता रावत ने उन्हें संबल दिया। ढाई साल की कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट से उन्हें क्लीन चिट मिली।

फ़िल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में निभाई फुटबॉल कोच की भूमिका

विरेन्द्र का दखल खेल जगत से लेकर बॉलीवुड तक रहा। वर्ष 2012 में उन्होंने करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में फुटबॉल कोच की भूमिका निभाई और वरुण धवन व सिद्धार्थ मल्होत्रा को ट्रेनिंग दी। वर्ष 2025 में वे परेश रावल की फिल्म ‘पास्ट टेंस’ में भी नजर आए। वर्ष 2022 में उन्हें मुंबई की कॉमनवेल्थ वोकेशनल यूनिवर्सिटी ने पीएचडी की मानद उपाधि प्रदान की। प्रदेश में फुटबॉल की बेहतरी के लिए भी उनका संघर्ष जारी है। साथ ही युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए भी वे निरंतर प्रयासरत हैं।

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