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दून में डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल की पुस्तक ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक : वोटर्स चॉइस पैटर्न्स इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ का लोकार्पण
Launch of Dr. Devi Prasad Semwal's book 'Ratios in the Republic: Voters' Choice Patterns in the World's Largest Democracy' in Doon

दून में डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल की पुस्तक ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक : वोटर्स चॉइस पैटर्न्स इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ का लोकार्पण
पुस्तक में 1951-52 से 2024 तक के सभी 18 लोकसभा चुनावों को आधार बनाकर मतदाताओं के निर्णय और चुनावी परिणामों में दिखाई देने वाले पैटर्न को समझने का प्रयास किया गया है
पुस्तक किसी चुनाव के परिणाम की निश्चित भविष्यवाणी करने का दावा नहीं करती, बल्कि उपलब्ध चुनावी अनुभवों और सामाजिक संदर्भों के आधार पर मानव व्यवहार के व्यापक पैटर्न को समझने की कोशिश करती है
पुस्तक संकेत देती है कि लोकतांत्रिक परिणामों में ऐसे नियमित प्रतिरूप दिखाई दे सकते हैं, जो आनुवंशिक रूप से प्रभावित मतदाता-प्रवृत्तियों में निहित विरासत-सदृश नियमों से जुड़े हो सकते हैं और जो बदलते सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिवेश में सक्रिय रहते हैं
देहरादून, 21 अगस्त 2026: दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में शुक्रवार को भारतीय राजस्व सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल की पुस्तक ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक : वोटर्स चॉइस पैटर्न्स इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ का लोकार्पण किया गया। इस दौरान देश के चुनावी लोकतंत्र, मतदाता व्यवहार, सामाजिक परिस्थितियों और बीते सात दशक में उभरते चुनावी पैटर्न पर गंभीर एवं रोचक चर्चा भी हुई। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने पुस्तक के विषय और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर लेखक से सवाल भी किए।
पुस्तक में 1951-52 से 2024 तक के सभी 18 लोकसभा चुनावों को आधार बनाकर मतदाताओं के निर्णय और चुनावी परिणामों में दिखाई देने वाले पैटर्न को समझने का प्रयास किया गया है। लेखक ने केवल राजनीतिक दलों, नेताओं, चुनाव प्रचार अथवा तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं को ही विश्लेषण का आधार नहीं बनाया है, बल्कि यह सवाल भी उठाया है कि क्या करोड़ों मतदाताओं के सामूहिक निर्णयों में मानव व्यवहार के कुछ ऐसे गहरे और बार-बार दिखाई देने वाले पैटर्न मौजूद हैं, जिन्हें व्यापक स्तर पर समझा जा सकता है।
चर्चा के दौरान डॉ. सेमवाल ने बताया कि पुस्तक का मूल विचार यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का चुनावी निर्णय केवल उसके ‘जीन’ या आनुवंशिक प्रवृत्तियों से निर्धारित होता है। इसके बजाय पुस्तक जीन और वातावरण की परस्पर क्रिया को समझने का प्रयास करती है। परिवार, शिक्षा, संस्कृति, आर्थिक स्थिति, सामाजिक परिवेश, राजनीतिक घटनाएं, नेतृत्व और समय-समय पर बदलती परिस्थितियां मानव व्यवहार को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि समान प्रवृत्तियां अलग-अलग सामाजिक एवं राजनीतिक वातावरण में अलग रूप ले सकती हैं।

सवाल-जवाब के दौरान उपस्थित लोगों ने यह जानने में उत्सुकता दिखाई गई कि क्या चुनावी परिणामों के आधार पर मतदाता व्यवहार में कोई दीर्घकालिक प्रवृत्ति पहचानी जा सकती है। राजनीतिक परिस्थितियां और सामाजिक वातावरण मतदाताओं के निर्णय को किस तरह प्रभावित करते हैं और क्या अतीत के चुनावी आंकड़ों के अध्ययन से भविष्य के लोकतांत्रिक व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है। लेखक ने स्पष्ट किया कि पुस्तक किसी चुनाव के परिणाम की निश्चित भविष्यवाणी करने का दावा नहीं करती, बल्कि उपलब्ध चुनावी अनुभवों और सामाजिक संदर्भों के आधार पर मानव व्यवहार के व्यापक पैटर्न को समझने की कोशिश करती है।
अध्यक्षता करते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के मानद निदेशक एवं पूर्व मुख्य सचिव एन. रविशंकर ने लोकतंत्र में मतदाता के निर्णय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल एवं विविधतापूर्ण देश में चुनाव केवल राजनीतिक सत्ता के निर्धारण की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सोच, आकांक्षाओं और बदलती प्राथमिकताओं को भी सामने लाते हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक अनिल रतूड़ी ने पुस्तक के विषय को समकालीन सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भों से जोड़ते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने के लिए केवल राजनीतिक घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यवहार, नेतृत्व, परिस्थितियां और जनमानस की भूमिका को भी समझना आवश्यक है।

कार्यक्रम में यह बात भी उभरकर सामने आई कि चुनावों का अध्ययन केवल राजनीतिक विश्लेषण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मतदाता व्यवहार और सामाजिक परिस्थितियों के बीच संबंधों की बेहतर समझ सार्वजनिक नीति, प्रशासन और व्यापक मानव कल्याण के लिए भी उपयोगी हो सकती है। कार्यक्रम में उपस्थित बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार, अधिकारी और युवा पाठकों ने दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की इस पहल को सार्थक बताते हुए कहा कि पुस्तक केन्द्रित ऐसे संवाद सार्वजनिक बौद्धिक जीवन को समृद्ध करते हैं। साथ ही पुस्तकालय को अध्ययन के साथ-साथ विचार-विमर्श के सक्रिय केन्द्र के रूप में स्थापित करते हैं।
संचालन दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के पुस्तकालयाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी डीके पाण्डे ने किया। इस अवसर पर विभापुरी दास, मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी, दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, डॉ.पंकज नैथानी, डॉ. कृपा राम नौटियाल, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर बिष्ट, योगिता थपलियाल, गीतांजलि भट्ट, कल्याण बुटोला, सुरेन्द्र सजवाण, अरुण कुमार असफल,. प्रेम पंचोली, डॉ. कुसुम नौटियाल, जेसी नैथानी, हरिओम पाली समेत प्रशासन एवं विभिन्न विभागों से जुड़े अधिकारी, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी, पत्रकार, साहित्यकार, लेखक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित रहे।

पुस्तक रोशियोज इन द रिपब्लिक के बारे में
यह पुस्तक एक शांत, लेकिन गहन प्रश्नों की पड़ताल करती है। गोपनीयता और स्वतंत्रता के साथ मतदान करने वाले लाखों लोग बार-बार पहचाने जा सकने वाले चुनावी प्रतिरूप क्यों उत्पन्न करते हैं? व्यवहार आनुवंशिकी, जनसंख्या पारिस्थितिकी, सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन तथा भारतीय आम चुनावों के साढ़े सात दशकों (1951-52 से 2024 तक) के आंकड़ों के आधार पर यह पुस्तक संकेत देती है कि लोकतांत्रिक परिणामों में ऐसे नियमित प्रतिरूप दिखाई दे सकते हैं, जो आनुवंशिक रूप से प्रभावित मतदाता-प्रवृत्तियों में निहित विरासत-सदृश नियमों से जुड़े हो सकते हैं और जो बदलते सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिवेश में सक्रिय रहते हैं।
जैविक नियतिवाद का कोई दावा किए बिना, यह अध्ययन इस बात की पड़ताल करता है कि बड़े पैमाने पर होने वाला चुनावी व्यवहार किस प्रकार संभाव्य संरचनाओं को प्रदर्शित कर सकता है, जो प्राकृतिक जनसंख्याओं में लंबे समय से देखे जाने वाले प्रतिरूपों से मिलती-जुलती हैं। देश का विशाल, विविधतापूर्ण और निरंतर विकसित होता मतदाता वर्ग इस प्रकार के अध्ययन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त आधार प्रदान करता है।
जनसंख्या-केंद्रित और अंतर्विषयक दृष्टिकोण से चुनावी इतिहास को देखने वाली यह पुस्तक विचारधारा और तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक चुनावों के भीतर मौजूद गहरे संरचनात्मक चक्रों और प्रतिरूपों को सामने लाती है। अंततः यह पाठकों को चुनावों को केवल सत्ता के लिए होने वाले संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि मानव व्यवहार की उन स्थायी अभिव्यक्तियों के रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है, जो जीवविज्ञान और पर्यावरण के परस्पर संबंध से निर्मित होती हैं।





