अंतरराष्ट्रीयअध्यात्मउत्तराखंडऑफबीटजागरूकताधरोहरप्रेरणामनोरंजनराष्ट्रीयसम्मानसंस्कृति

जब ढोली बचेंगे, तभी बजेंगे ढोल-दमाऊ

The *dhol-damau* will resound only if the *dholi*s survive.

खबर को सुनें


जब ढोली बचेंगे, तभी बजेंगे ढोल-दमाऊ

दो दिवसीय धरोहर संवाद कार्यक्रम में टिहरी, अल्मोड़ा, बागेश्वर के ढोलवादकों ने किया ढोल विधाओं का प्रदर्शन, ढोलवादक डा. सोहनलाल ने लोगों को समझाए ढोल की ताल के नियम, इन तालों का प्रदर्शन भी किया

देहरादून, 09 सितंबर 2026 : ऋषिकेश के पास मुनिकीरेती के स्वामीनारायण आश्रम में ‘अपनी धरोहर’ न्यास की ओर से आयोजित दो दिवसीय धरोहर संवाद के
अंतिम दिन टिहरी से आए ढोलवादक डा. सोहनलाल ने मंत्रों के साथ ढोल की ताल के नियम लोगों को समझाए। उन्होंने बताया कि ढोल पर 750 से अधिक तरह की ताल
बजाकर वार्तालाप किया जा सकता है। इन तालों का उन्होंने प्रदर्शन भी किया। उन्होंने कहा कि जब ढोली बचेंगे, तभी उत्तराखंड में ढोल-दमाऊ भी बजेगा।

बुधवार को कार्यक्रम का समापन ढोल विधाओं की प्रस्तुति के साथ हुआ। मुख्य आकर्षण पारंपरिक ढोल विधाओं की प्रस्तुति रही। बागेश्वर से पहुंचे ढोलवादक
मोहन दास ने ढोल के साथ कई प्राचीन जागरों की प्रस्तुति दी। टिहरी के बूढ़ाकेदार से बचन दास और अल्मोड़ा से अपने हुड़के के साथ पहुंचे सुंदर दास ने भी कई विधाओं व लुप्त हो रही लोक रचनाओं की प्रस्तुति दी। माणा गांव के कुंदन सिंह कपोला ने महिलाओं की टीम के साथ कार्यक्रम में शिरकत की।

इससे पूर्व, कार्यक्रम का शुभारंभ आरएसएस के प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल, संस्कृतिकर्मी प्रोफेसर डीआर पुरोहित, साहित्यकार गणेश खुगशाल ‘गणी’ और महंत रामकृष्ण ने दीप प्रज्वलित कर किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम निश्चित रूप से उत्तराखंड की संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होंगे। उत्तराखंड के ढोल और परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने और उसके प्रति जागरूकता लाने की दिशा में ‘अपनी धरोहर’ संस्था का यह प्रयास प्रशंसनीय है।

ढोल को आजीविका के साथ जोड़ने की जरूरत

संस्कृतिकर्मी प्रो. पुरोहित ने कहा कि ढोली को सम्मान और पैसा देना होगा, तभी यह परंपरा बचेगी। असल में हमें अब ढोल को आजीविका के साथ जोड़ने की जरूरत है, ताकि इसकी लुप्त हो रही कलाओं व रहस्यों को आगे भी कायम रख सकें। अपनी धरोहर संस्था के अध्यक्ष विजय भट्ट ने कहा कि यह कार्यक्रम केवल वाद्य प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि ढोल-दमाऊ के पीछे मौजूद पारंपरिक ज्ञान, कौशल, वादन की विविधता और उसके सांस्कृतिक महत्व को भी सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। साहित्यकार एवं गढ़वाल विवि के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने ढोल के इतिहास, परंपराओं व लोक में इसके महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन नीलम ध्यानी जुयाल ने किया।

Global Ganga News

साथियों, Globalganga.com के मंच पर आपका स्वागत करते हुए हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है, जब हम भी वेब पोर्टल की भीड़ में शामिल होने जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ कि भीड़ का हिस्सा होते हुए भी हमेशा भीड़ से अलग दिखने का प्रयास करेंगे। हम चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं का देश-दुनिया में प्रसार हो, उत्तराखंड की बोली-भाषाएं समृद्ध हों और उन्हें स्वतंत्र पहचान मिले, यहां आध्यात्मिक पर्यटन एवं तीर्थाटन का विकास हो …और सबसे अहम बात यह कि इस सब में हमारी भी कुछ न कुछ भागीदारी अवश्य रहे। साथ ही एक विनम्र आग्रह भी है कि अपने कीमती सुझावों से समय-समय पर अवगत कराते रहें। ताकि सुधार की प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहे। अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि हम एक-दूसरे पर भरोसा बनाये रखें। यही भरोसा समाज में संवाद की बुनियाद मजबूत करने का आधार बनेगा। इन्हीं शब्दों के साथ आइये! कामना करें कि- ‘सबके हृदय में सर्वदा संवेदना की दाह हो, हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो। -संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button