बर्फबारी के देवताल-माणा पास यात्रा का रोमांच
The thrill of the journey to Devtal and Mana Pass amidst snowfall.

बर्फबारी के देवताल-माणा पास यात्रा का रोमांच
सरोवर की पूजा-अर्चना कर देश की समृद्धि की कामना की, यात्रियों ने राक्षस ताल, मानव ताल और चीन सीमा के भी किए दर्शन
देहरादून, 17 सितंबर 2026: शून्य से नीचे तापमान, चारों ओर बिछी बर्फ की सफेद चादर और घने कोहरे के बीच ‘देवताल-माणा पास सीमा दर्शन यात्रा’ भक्ति और राष्ट्रप्रेम के अद्भुत संगम के साथ गुरुवार को संपन्न हुई। चमोली जिले में समुद्रतल से 18,500 फीट से अधिक की चुनौतीपूर्ण ऊंचाई पर देवताल पहुंचे यात्रियों ने कड़ाके की ठंड की परवाह न करते हुए सरोवर की पूजा-अर्चना कर देश की समृद्धि और सुरक्षा की कामना की।
बदरीनाथ धाम से लगभग 55 किमी दूर उच्च हिमालय क्षेत्र में स्थित देवताल-माणा पास का सफर बेहद रोमांचकारी होता है। यात्रियों ने इस दौरान देवताल समेत राक्षस ताल, मानव ताल और चीन सीमा के दर्शन भी किए। इस दौरान वरिष्ठ कवि नीरज नैथानी के नेतृत्व में राष्ट्रप्रेम पर आधारित संक्षिप्त कवि गोष्ठी भी हुई। इसमें गाजियाबाद से आए अमरेंद्र राय, श्रीनगर से राजेश जैन आदि ने भाग लिया। यात्रा में नीरज नैथानी, राजेश नंबूरी, राजेश जैन, राजेंद्र कप्रवान, माधुरी नैथानी, लाजवंती गौड़ आदि शामिल हुए।
उत्तराखंड वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के अध्यक्ष रामचंद्र गौड़ के नेतृत्व में यात्रा का आयोजन हुआ। गौड़ ने कहा कि हिमालय को नजदीक से देखने के लिए ऐसी यात्राओं का आयोजन जरूरी है। कहा कि देवभूमि में अनेक सिद्ध स्थान आज भी लोकप्रिय नहीं हो सके हैं। इस दिशा में काम करने की जरूरत है। यात्रा संयोजक डा. सुभाष चंद्र थलेड़ी ने कहा कि इस लोक विरासतीय यात्रा को भविष्य में विस्तार दिया जाएगा। इसे नीती घाटी के धार्मिक स्थलों पार्वती कुंड, टिम्मरसैंण महादेव गुफा और रिमखिम से भी जोड़ा जाएगा।
इस वर्ष यात्रा कन्या संक्रांति को संपन्न हुई। पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ ने देवताल के तट पर दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर स्थापित किया था, जिसमें हवन भी किया गया। यह मंदिर विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित हनुमान मंदिर है। सरस्वती नदी का उद्गम भी इसी सरोवर से होता है, जो आगे चलकर माणा गांव में अलकनंदा नदी में मिलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार,
द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण इसी मार्ग से कैलास-मानसरोवर गए थे और उन्होंने देवताल में स्नान किया था। तिब्बत स्थित थोलिंग मठ से बदरीनाथ मंदिर को चंवर, कस्तूरी आदि का प्रसाद इसी मार्ग से भेजा जाता था और भगवान बदरीनाथ का प्रसाद तिब्बत भेजा जाता था।



