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जलस्रोतों का सिमटना दूनघाटी के लिए चुनौती

The shrinking of water sources is a challenge for the Doon Valley

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जलस्रोतों का सिमटना दूनघाटी के लिए चुनौती

दून पुस्तकालय में खबरपात कार्यक्रम में विकास और देहरादून के सिमटते जल संसाधनों पर हुई चर्चा

देहरादून, 3 फरवरी, 2026: कथित तीव्र विकास की चाह ने देहरादून के पर्यावरण को किस कदर नुकसान पहुंचाया है, इस बात पर गहन चर्चा सोमवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में ‘खबरपात’ कार्यक्रम में हुई। कहा गया कि मानवीय गतिविधियों व तीव्र विकास प्रक्रिया से उपजे कारणों से ज्यादा नुकसान यहां के जलस्रोतों का हुआ है। दून की धरती का भूमिगत जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है और यह भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है। ‘विकास के भेंट चढ़े देहरादून के जलाशय’ विषय पर चर्चा पर मुख्य प्रस्तुति जन विज्ञान के विजय भट्ट ने दी। वे पिछले कई सालों से देहरादून के स्थानीय पर्यावरण व पारिस्थितिकी पर जमीनी काम कर रहे हैं। इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट ने किया।

अपने पीपीटी प्रजेंटेशन में विजय भट्ट ने कहा कि देहरादून किसी जमाने में नहर, जलस्रोत और जलकुंड व छोटी जल धाराओं का शहर था। चारों तरफ जंगल होने से यहां की आबोहवा स्वास्थ्यप्रद होती थी। गर्मियों में शीतल हवा चलती थी, तब देशभर के लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए यहां आते थे। लेकिन, हालिया वर्षों में आर्थिक लाभ की लालसा व तीव्र विकास ने सब-कुछ खत्म जैसा कर दिया है। इस विकास ने देहरादून के जलस्रोतों को एक तरह से लील लिया है। इसका असर भूमिगत जल पर पड़ रहा है और देहरादून  जल संकट की समस्या की ओर बढ़ रहा है।

ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र करते हुए विजय भट्ट ने कहा कि नजीबुद्दौला के शासनकाल में दूनघाटी में बड़े पैमाने पर कुएं खोदे गये थे और आम के पेड़ लगाये गये थे। अंग्रेजों के दौर में भी कुएं खोदे गये और नहरें  बनाई गईं। अंग्रेज अधिकारी मिस्टर सोर द्वार बनाया गया एक कुआं कचहरी परिसर में आज भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि देहरादून में जहां जोहड़ (जलकुंड ) थे, वहां अब या तो बड़े-बड़े भवन हैं या पार्क बनाये जा रहे हैं। जहां नहरें थीं, वहां सड़कों का जाल बिछ गया है। एलीवेटेड रोड व अन्य निर्माणों से प्राकृतिक जंगलों का  विनाश हो रहा है। जो कुछ जल संसाधन अब भी बचे हुए हैं, वे भी जंगलों के विनाश से खत्म होेने के कगार पर हैं।

उन्होंने याद दिलाया कि दून में कई जगहों के नाम के साथ पानी जुड़ा हुआ है। मसलन नालापानी, भोपाल पानी, झड़ीपानी, खट्टा पानी आदि। यह इस बात का प्रतीक है कि दून एक तरह से पानी की बहुलता वाला शहर था और यही पानी इसकी आबोहवा और भूमिगत जलस्तर को  सतत रूप से बनाये रखती थी। पर चिंता इस बात की है कि आज यह सब खत्म हो रहा है।

संचालन करते हुए त्रिलोचन भट्ट ने कहा कि सरकारी नीतियां बनाते समय पर्यावरणीय पक्ष को गहनता से देखना बहुत जरूरी बात है। पर्यावरण की  अनदेखी होना हम सबके लिए चिन्ताजनक है। दून का तापमान साल-दर-साल बढ़ रहा है। वह 43 डिग्री तक पहुंच जाता है। जंगलों की रक्षा के लिए लोग सड़कों पर उतरते हैं, पर आमतौर पर इस तरह के आंदोलनों के अनदेखी की जाती है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने देहरादून के पर्यावरण को लेकर कई सवाल भी पूछे।

इस अवसर पर पर्यावरणविद डॉ. रवि चोपड़ा, हरिओम, देवेन्द्र कांडपाल, चन्द्रशेखर तिवारी, डॉ. डीके पाण्डे, आलोक सरीन, कमलेश के.खन्तवाल, हिमांशु अरोड़ा, डॉ. वीके डोभाल, सुंदर विष्ट आदि मौजूद रहे।

Global Ganga News

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