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ऐसे तो खाली हो जाएंगे गांव, गुलदार के डर से तीन बुजुर्ग महिलाओं ने गांव छोड़ा

If this continues, the villages will become empty; three elderly women left the village due to fear of leopard

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ऐसे तो खाली हो जाएंगे गांव, गुलदार के डर से तीन बुजुर्ग महिलाओं ने गांव छोड़ा

अपने बच्चों के पास हरिद्वार, देहरादून व श्रीनगर रहने चली गईं कोटी गांव की ये तीनों महिलाएं, 20 नवंबर को इस गांव में एक बुजुर्ग महिला को बना दिया था गुलदार ने शिकार, तब से लगातार गांव में मंंडरा रहा गुलदार, दर के मारे घरों से बाहर निकलने में भी डर रहे लोग

पौड़ी, 28 नवंबर 2025 : गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्र में गुलदार और भालू के बढ़ते हमलों से बुरी तरह सहमे ग्रामीण अब सुरक्षित ठिकाने तलाशने लगे हैं। पौड़ी जिले के खिर्सू विकासखंड की तीन बुजुर्ग महिलाओं ने तो अपने गांव कोटी से हमेशा के लिए विदा ले ली। तीनों महिलाएं अपने बच्चों के पास रहने हरिद्वार, देहरादून व श्रीनगर चली गईं।

कोटी गांव में बीते 20 नवंबर को एक 64-वर्षीय महिला को गुलदार निवाला बना लिया था। इसके बाद से डरे-सहमे ग्रामीण न तो मवेशियों के लिए चारापत्ती लेने जंगल जा पा रहे हैं, न खेतों में काम करने के लिए ही। बच्चों को स्कूल छोड़ने और लाने के लिए भी समूह में जाना पड़ रहा है। ऐसे में कई लोगों ने अपने बुजुर्ग माता-पिता को शहर ले जाने का मन बना लिया। श्रीनगर में शिक्षा विभाग में कार्यरत कृष्ण कुमार बताते हैं कि दो साल पहले उन्होंने गांव में नया मकान बनाया था, जिसमें उनकी 65-वर्षीय मां कांति देवी अकेले रह रही थीं। वह भी लगातार गांव आते-जाते रहते थे और पिछले एक माह से तो वह गांव से ही स्कूल आना-जाना कर रहे थे, लेकिन हालिया घटना के बाद से गांव रहने लायक नहीं रह गया। इसलिए उन्हें मां को श्रीनगर लाना पड़ा।

कोटी के ही संदीप सिंह बताते हैं कि दो साल पहले उन्होंने गांव मकान की मरम्मत कराई थी। देखभाल के लिए उनकी 56-वर्षीय मां कुशला देवी गांव में ही रहती थीं, लेकिन गुलदार की दहशत के चलते अब उन्हें मां को देहरादून ले जाना पड़ा है। इसी तरह हरिद्वार में अपना व्यवसाय कर रहे जसपाल सिंह ने भी एक साल पहले गांव में नया घर बनाया था। उनकी 68-वर्षीय मां सरला देवी इस घर मे अकेले रहती थीं, लेकिन अब सुरक्षा की खातिर वह भी उन्हें साथ ले जा रहे हैं।

गरीबों का क्या होगा

जो परिवार आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वह तो गांव छोड़कर कहीं भी जा सकते हैं, लेकिन कमजोर आर्थिकी वाले परिवारों के पास तो यह भी विकल्प नहीं। जिम्मेदार तो आश्वासनों से उनका पेट भर दे रहे हैं, लेकिन यह देखने वाला कोई नहीं कि वह कैसे रह रहे होंगे। कोटी गांव को ही देख लीजिए, पहले कैसे भरा-पूरा था। गांव के खाली पड़े मकान इसकी गवाही दे रहे है। लेकिन, अब ले-देकर बीस से बाईस परिवार ही गांव में रह गए हैं।

Global Ganga News

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