मशीन नहीं, इंसान था पहला सुपर कंप्यूटर… ऐसे ही एक भारतीय सुपर कंप्यूटर ने मापी थी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई

एवरेस्ट की ऊंचाई मापने वाले राधानाथ सिकदर को नहीं मिला वह सम्मान, जिसके वे हकदार थे, 5 सितंबर को हुआ था जन्म
देहरादून, 5 अक्टूबर: विज्ञान और गणित की दुनिया में आज सुपर कंप्यूटर मशीनी क्षमता का प्रतीक बन चुके हैं, लेकिन 19वीं सदी में जब मशीनें नहीं थीं, तब एक इंसान ने वह कर दिखाया, जो आज कंप्यूटरों की मदद से संभव है। यह थे राधानाथ सिकदर, भारत के महान गणितज्ञ और सर्वेक्षक, जिन्होंने वर्ष 1852 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की सटीक ऊंचाई का पता लगाया।
5 अक्टूबर 1813 को कोलकाता में जन्मे राधानाथ सिकदर को संख्याओं से बचपन से ही लगाव था। उन्होंने कोलकाता के एक कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और बाद में अध्यापन करने लगे। इस दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध विचारक हेनरी लुई विवियन डेरोजियो से हुई, जिनकी प्रेरणा ने उनके भीतर तर्क और गणना की जिज्ञासा को और गहरा कर दिया।
सिर्फ 18 वर्ष की आयु में, 19 दिसंबर 1831 को उन्हें भारत के “ग्रेट ट्रिगनोमेट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया” में बतौर ‘सुपर कंप्यूटर’ नियुक्त किया गया। उस दौर में ‘कंप्यूटर’ शब्द किसी मशीन के लिए नहीं, बल्कि उन गणितज्ञों के लिए प्रयोग होता था जो कठिन गणनाएं करते थे। उन्हें देहरादून भेजा गया, जहां उन्होंने अपने असाधारण गणितीय कौशल से जॉर्ज एवरेस्ट का भरोसा जीता। उनका कार्य था, धरती के आकार और पर्वतों की ऊंचाई को मापना, वह भी उस युग में जब न जीपीएस था, न उपग्रह। वर्ष 1843 में जब जॉर्ज एवरेस्ट सेवानिवृत्त हुए, तो राधानाथ ने नए सर्वेक्षक एंड्रयू वॉ के निर्देशन में काम जारी रखा।
वर्ष 1851 में उन्हें मुख्य कंप्यूटर बनाया गया और कोलकाता स्थानांतरित किया गया। यहीं उन्होंने छह अलग-अलग बिंदुओं से लिए गए अवलोकनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि कंचनजंघा नहीं, बल्कि ‘पीक 15’ (वर्तमान में माउंट एवरेस्ट) पृथ्वी की सबसे ऊंची चोटी है।
अफसोस की बात यह रही कि ब्रिटिश शासन ने इस खोज का श्रेय सिकदर को नहीं दिया। पर्वत का नाम जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रख दिया गया।
यह भी जानें
- सिकदर ने एवरेस्ट की जो ऊंचाई मापी वह 29,002 फीट थी, जो आधुनिक माप 29,029 फीट के लगभग बराबर है। यह उनके गणितीय कौशल और वैज्ञानिक दृष्टि का अद्भुत प्रमाण था।
- राधानाथ सिकदर को आगे चलकर जर्मन फिलॉसॉफिकल सोसाइटी की ओर से कॉरेस्पोंडिंग मेंबर बनाया गया। परंतु उनके जीवनकाल में उन्हें वह मान्यता नहीं मिली जिसके वे सच्चे अधिकारी थे।
- 17 मई 1870 को इस महान गणितज्ञ का निधन हो गया।
- देर से ही सही, उनके योगदान को याद करने की शुरुआत हुई है। मई 2021 में हिंदुस्तान माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट ने अपनी लाइब्रेरी का नाम ‘सिकदर भवन’ रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।



