अध्यात्मउत्तराखंडधर्म-परम्पराएंसंस्कृति

बारह साल बाद तमलाग में फिर मोरी मेले का उल्लास

After twelve years, the joy of Mori fair is again in Tamlag

खबर को सुनें


बारह साल बाद तमलाग में फिर मोरी मेले का उल्लास

नंदा देवी राजजात के बाद 12 साल में आयोजित होने वाला उत्तराखंड का दूसरा धार्मिक अनुष्ठान है मोरी मेला, पौड़ी जिले की गगवाड़स्यूं घाटी के तमलाग गांव में छह माह तक चलता है मोरी मेला, इतनी लंबी का संभवतः देश का अकेला उत्सव है यह

पौड़ी: पौड़ी जिले की गगवाड़स्यूं घाटी के तमलाग गांव में अब छह माह मोरी मेले की धूम रहेगी। रविवार सात दिसंबर यहां मेले की भव्य शुरुआत हो गई। उत्तराखंड में हरिद्वार कुम्भ और नंदा देवी राजजात के बाद यह ऐसा तीसरा धार्मिक अनुष्ठान है जो 12 साल के अंतराल में आयोजित होता है। मेला अवधि में छह माह तक पांडव नृत्य के साथ अनेक आयोजन होंगे। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीणों के साथ बड़ी संख्या में प्रवासी भी जुट रहे हैं।

परंपरा के अनुसार रविवार को शुभ मुहूर्त पर माता कुंती को न्योता देकर फिर उन्हें भैरव मंदिर चौक तक लाया गया और फिर हुई मंडाण के साथ मेले की भव्य शुरुआत। मेला अवधि में छह माह तक पांडव नृत्य के साथ विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान तमलाग गांव के मध्य स्थित भैरव मंदिर चौक में प्रतिदिन ढोल सागर के साथ पश्वाओं पर पांडव अवतरित होंगे। गणेश पूजन के साथ ही आगामी 13 अप्रैल को गांव से देवप्रयाग संगम तक पैदल यात्रा भी की जाएगी। गेंडी वध, दो पेड़ गांव लाए जाने सहित अन्य पारंपरिक अनुष्ठानों का भी विधि-विधान से आयोजन किया जाएगा।

पांडवों ने तमलाग में गुजारे थे कुछ दिन

मोरी मेला में पांडव नृत्य के माध्यम से पांडवों का आह्वान किया जाता है। मान्यता है कि जब पांडव आपने वनवास काल के समय गढ़वाल क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब उन्होंने कुछ दिन तमलाग गांव में भी प्रवास किया था। गांव वालों ने पांडवों का खूब आदर-सत्कार किया था। इस कारण माता कुंती ने तमलाग गांव को अपने ससुराल की उपाधि दी। इस पर तमलाग के ग्रामीण 12 साल के अंतराल में पांडवों का विशेष आह्वान करते हैं और मोरी उत्सव मनाया जाता है।

Global Ganga News

साथियों, Globalganga.com के मंच पर आपका स्वागत करते हुए हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है, जब हम भी वेब पोर्टल की भीड़ में शामिल होने जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ कि भीड़ का हिस्सा होते हुए भी हमेशा भीड़ से अलग दिखने का प्रयास करेंगे। हम चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं का देश-दुनिया में प्रसार हो, उत्तराखंड की बोली-भाषाएं समृद्ध हों और उन्हें स्वतंत्र पहचान मिले, यहां आध्यात्मिक पर्यटन एवं तीर्थाटन का विकास हो …और सबसे अहम बात यह कि इस सब में हमारी भी कुछ न कुछ भागीदारी अवश्य रहे। साथ ही एक विनम्र आग्रह भी है कि अपने कीमती सुझावों से समय-समय पर अवगत कराते रहें। ताकि सुधार की प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहे। अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि हम एक-दूसरे पर भरोसा बनाये रखें। यही भरोसा समाज में संवाद की बुनियाद मजबूत करने का आधार बनेगा। इन्हीं शब्दों के साथ आइये! कामना करें कि- ‘सबके हृदय में सर्वदा संवेदना की दाह हो, हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो। -संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button