देहरादून। उत्तरकाशी जिले में समुद्रतल से करीब आठ हजार फीट की ऊंचाई पर हर्षिल घाटी के पास बसा धराली गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सेब के बागान और राजमा की खेती के लिए प्रसिद्ध रहा है। इसे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए एक शांत एवं आकर्षक ठहराव स्थल माना जाता था। गंगोत्री और धराली के मध्य महज 20 किमी का फासला है, इसलिए ज्यादातर यात्री यहां अवश्य रुकते थे। हालांकि, अब धराली की पुनर्स्थापना तक ऐसा संभव नहीं हो पाएगा।

कुछ दिन पहले तक मैं भी धराली जाने की सोच रहा था। बड़ी इच्छा थी वहां भागीरथी और खीर गंगा नदी के संगम पर स्थित ऐतिहासिक कल्प केदार मंदिर को देखने की। हिमालयी क्षेत्र में सभ्यता के इतिहास से परिचित होने की। लेकिन, दुर्भाग्य देखिए कि अचानक सब-कुछ तबाह हो गया। धराली भी और कल्प केदार मंदिर भी। पांच अगस्त 2025 मंगलवार दोपहर डेढ़ बजे के आसपास खबर मिली कि खीर गंगा के जल संग्रहण क्षेत्र श्रीकंठ पर्वत पर धमाका हुआ है, मानो बम फटा हो। इसके बाद एक सैलाब आया और घर, मकान, दुकान, होटल, होम स्टे, कार-बाइक-स्कूटर, खेत-खलिहान, सेब के बाग- सब बहाकर ले गया। वह भी चंद मिनट में। किसी को संभलने तक का मौका नहीं मिला। अब वहां मलबे के सिवा कुछ नहीं बचा है। लगभग एक वर्ग किमी क्षेत्र में यह मलबा फैला हुआ है, जिसकी ऊंचाई 40 से 50 फीट आंकी जा रही है। इससे ऐसा प्रतीत होता है, मानो यहां कभी कुछ था ही नहीं।
इस आपदा में धराली में बड़े पैमाने पर भूमि और सेब के बागीचों को नुकसान पहुंचा। सौ से अधिक परिवार प्रभावित हुए और 70 के आसपास लोग लापता हैं। कुछ लोग इस संख्या को 150 के आसपास बता रहे हैं। इस आपदा का कारण खीर गंगा के ऊपर कैचमेंट एरिया में अतिवृष्टि को बताया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अतिवृष्टि के कारण श्रीकंठ पर्वत पर ग्लेशियर के पास जगह-जगह जमा भारी मलबा निचले क्षेत्रों में खिसकता चला गया और धराली की तबाही का कारण बना। यह तबाही वर्ष 2013 की केदारनाथ तबाही से किसी मायने में कम नहीं थी। अगर यह चारधाम यात्रा का चरम काल होता तो जन-धन की भारी हानि होना तय था। गंगोत्री धाम का प्रमुख पड़ाव होने के कारण इस अवधि में यहां दो से तीन हजार यात्री चौबीसों घंटे मौजूद रहते हैं। जाहिर है ऐसी स्थिति में यहां बचने की एक प्रतिशत भी गुंजाइश नहीं है, क्योंकि तलहटी में पूरे क्षेत्र को भागीरथी नदी ने घेरा हुआ है।
अब सवाल यह है कि हम आखिर सबक कब लेंगे। पहले केदारनाथ, फिर रैणी और अब धराली। इन सभी का हश्र हम देख चुके हैं। प्रकृति की राह में जो बाधाएं मानव ने खड़ी कीं, प्रकृति ने एक झटके में उनको पलट दिया। विकास जरूरी है, लेकिन उसके सुरक्षित भविष्य के लिए उतना ही जरूरी है प्रकृति के साथ समन्वय। विशेषज्ञ भी लगातार इस बारे में चेताते आ रहे हैं। उम्मीद है कि धराली चेतावनी हम समझेंगे।

फिर अंर्तध्यान हुए धराली के शिव
खीर गंगा के सैलाब ने धराली कस्बे को ही नहीं निगला, ऐतिहासिक कल्प केदार मंदिर को भी अपने आगोश में समा लिया। यह मंदिर न सिर्फ प्राचीन वास्तु कला और समृद्ध इतिहास का प्रतीक था, बल्कि 19वीं सदी में आई महाआपदा का सबूत भी था। वर्ष 1945 में स्थानीय लोगों को खुदाई में यह मंदिर मिला था, जिसका गर्भगृह प्रवेश द्वार से करीब सात मीटर नीचे जमीन के अंदर था। इतिहासकार बताते हैं कि यह मंदिर कभी 240 मंदिरों के समूह का हिस्सा हुआ करता था, जो एक बार फिर इतिहास बन गया है। पुरातत्व अधिकारी बताते हैं कि खुदाई में मंदिर और आसपास जो अवशेष मिले थे, वह 17वीं सदी के थे। हालांकि, स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि सैलाब में समाए धराली के शिव एक बार फिर प्रकट होंगे।



