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दो साल से मस्जिद के बाहर खड़ी थी कार, सच्चाई सामने आई तो कांप उठे लोग

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ū5 अक्टूबर 2025ः गरीबी कभी-कभी इंसान को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है कि जिंदगी एक जंग बन जाती है। मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के बंदर बरू सेंटुल इलाके में एक ऐसी ही कहानी सामने आई, जिसने हर किसी को झकझोर दिया।

यहां मस्जिद अम्रू अल-अस के परिसर में दो साल से खड़ी एक पुरानी कार को लोग खटारा समझते थे, लेकिन जब किसी ने भीतर झांका, तो नजारा देखकर निशब्द हो गया। वो कार कबाड़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक पूरा घर थी, जिसमें रह रहे थे पति-पत्नी और उनके दो छोटे बच्चे।

यह परिवार पाहांग प्रांत के टेमरलोह से आया था। बेहतर जिंदगी की उम्मीद लेकर उन्होंने शहर का रुख किया था, लेकिन बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और आसमान छूते किराये ने उन्हें सड़क पर ला खड़ा किया। जब सिर पर छत नहीं बची, तो उन्होंने उसी कार को अपना आश्रय बना लिया। दो साल से यही कार उनका संसार थी। बरसात में कार के भीतर रिसता पानी, गर्मी में तपा हुआ लोहे का ढांचा और सर्दी में जमा देने वाली ठंड परिवार इसी कार में बिताता था।

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यह सच्चाई तब सबके सामने आई, जब फेडरल टेरिटरी उम्नो इन्फॉर्मेशन की चीफ दातुक सुलम मुजफ्फर गुलम मुस्तकीम को किसी ने इसकी खबर दी। उन्होंने इसे फेसबुक पर शेयर किया। उनकी पोस्ट वायरल होते ही लोगों के दिल पिघल गए। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने इस परिवार के लिए मदद की मांग की। फेडरल टेरिटरी इस्लामिक रिलीजियस काउंसिल और कुआलालंपुर सिटी हॉल से संपर्क कर परिवार के लिए ट्रांजिट हाउस की व्यवस्था करवाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। उम्मीद है कि यह परिवार जल्द ही चार दीवारों के भीतर सांस ले सकेगा।

मलेशिया में गरीबी की यह समस्या नई नहीं है। कोविड-19 महामारी के बाद आर्थिक मंदी ने लाखों परिवारों को प्रभावित किया है।कुआलालंपुर जैसे महंगे शहर में एक छोटा फ्लैट का किराया 1500 रिंगिट (लगभग 28,000 रुपये) से शुरू होता है, जो कई परिवारों के लिए असंभव है।

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