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मानसून पैटर्न में आए बदलाव से वैज्ञानिक हैरत में

Scientists are surprised by the change in monsoon pattern

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मानसून पैटर्न में आए बदलाव से वैज्ञानिक हैरत में

इस साल 20 जून से 18 सितंबर तक बादल फटने की नौ बडी घटनाएं दर्ज

देहरादून, 18 सितंबर 2025  : इस बार मानसून के पैटर्न में आए बदलाव से वैज्ञानिक हैरत में हैं।  उत्‍तराखंड में मानसून ने 20 जून को प्रवेश किया था और तब से अब तक बादल फटने की करीब नौ बडी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें 27 से ज्‍यादा लोग जान गंवा चुके हैं, जबकि 100 से अधिक लापता हैं। बारिश और भूस्‍खलन के चलते प्रदेश को हजारों करोड रुपये का नुकसान हो चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार मानसून की ‘चाल’ में आए बदलाव के चलते इस तरह की घटनाएं अधिक हो रही हैं। मानसून के पैटर्न में आए बदलाव का परिणाम ही है कि इस सीजन में अरुणाचल प्रदेश मे बारिश में 37% , जबकि असम और मेघालय में  42%  की कमी दर्ज की गई।  इसके विपरीत इसी अवधि में उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य से 34% अधिक वर्षा हुई।
बादल फटने की घटनाओं को लेकर यदि इतिहास में झांकें तो कुछ रोचक तथ्‍य पता चलते हैं। जर्नल ऑफ जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण इस हिमालयी क्षेत्र में ऐसी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है।  वर्ष 2010-2020 के बीच बादल फटने की 29 बडी घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें जन-धन की भारी हानि हुई है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में पिछले 20 वर्षों  में बादल फटने की सबसे ज्यादा 50 घटनाएं 2021 में दर्ज की गईं। इस वर्ष मई में ही लगभग 24 मामलों की पुष्टि हुई। कुल मिलाकर, 2021 में 308 लोग मारे गए और 61 लापता  हुए।
एनएनबी गढवाल विश्‍वविद्वालय में भू-विज्ञान विभाग के विभागाध्‍यक्ष प्रो एमपीएस बिष्‍ट के अनुसार इस बार मानसून की ‘चाल’ में बडा बदलाव महसूस किया गया है। बंगाल की खाडी से उठने वाली हवाएं अब पश्चिमी हिमालय से टकरा रही हैं, जबकि पहले येे हवाएं हिमालय के पूर्वी भाग से टकराती थीं। नतीजतन, उत्‍तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्‍मू-कश्‍मीर में भारी बारिश देखने को मिल रही है। इसके अलावा उच्‍च हिमालयी क्षेत्रों में बादल संकरी घाटियों में फंस जाते है, ऐसे में बादल फटने की घटनाएं भी बढ रही हैं। दरअसल, देखा जाए तो मौसम के पैटर्न में आ रहे बदलाव पर नए सिरे से शोध की आवश्‍यकता है। यदि यह पैटर्न आगे भी जारी रहता है तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

क्‍यों फटते हैं बादल

आसान भाषा में समझें तो  जब गर्म हवा भाप को लेकर तेजी से ऊपर जाती है तो इससे बड़े-बड़े बादल बन जाते हैं। इन विशाल बादलों में भारी मात्रा में पानी संग्रहित होता है। ऊपर उठती हुई हवा इस पानी को नीचे नहीं गिरने देती। जब बादल में पानी का वजन इतना ज्यादा हो जाता है कि ऊपर उठती हवा भी उसे रोक नहीं पाती, तो सारा पानी एक साथ, एक ही क्षेत्र में बरस जाता है। वैज्ञानिक तौर पर देखें तो जब एक सीमित दायरे में एक घंटे में 100 मिमी बारिश दर्ज की जाए तो इसे बादल फटना कहा जाता है।
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20 जून से 18 सितंबर तक बादल फटने की प्रमुख घटनाएं

29 जून: उत्तरकाशी जिले में यमुनोत्री हाईवे पर बादल फटने से हुए भूस्खलन  में दो श्रमिकों की मौत, सात लापता।
05 अगस्त : उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बादल फटने से 63 लापता, दो शव मिले ।
06 अगस्त : पौडी जिले के थैलीसैंण क्षेत्र के बुरासी गांव में बादल फटने से दो महिलाओं की मौत
23 अगस्त : चमोली जिले के थराली कस्बे में बादल फटने से दो व्यक्ति की मौत और एक लापता।
28 अगस्‍त : रुद्रप्रयाग के बसुकेदार और छेनागाड में बादल फटने से भारी तबाही
30 अगस्त : बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील के पौसारी गाँव में बादल फटने से दो की मौत, तीन लापता।
16 सितंबर : देहरादून  जिले में बादल फटने से भारी तबाही 15 की मौत, 16 लापता।
16 सितंबर: पिथौरागढ़ और नैनीताल जिले में बादल फटने से भारी नुकसान, दोनों जिलों में एक-एक मौत
18 सितंबर : चमोली जिले के नंदानगर घाट में बादल फटने से 10 लापता।

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