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अनचाहा मेहमान कैंसरः मन के हारे हार, मन के जीते जीत

पुस्तक समीक्षा

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Rajni Chander, Dehradun: कैंसर का नाम सुनते ही लोगों की सांसें अटक जाती हैं। हर वर्ष इस बीमारी से दुनियाभर में हजारों लोगों की जान जाती है। लेकिन, अगर यह बीमारी समय पर प्रकट हो जाए और पूरी दृढ़ता के साथ इसका सामना किया जाए तो इसे हराना मुश्किल नहीं। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत, यही बताती है डा. रामेश्वरी नादान की पुस्तक ‘अनचाहा मेहमान कैंसर’।

डॉ. रामेश्वरी स्वयं इसी बीमारी से उबर चुकी हैं और यह पुस्तक उन्हीं संस्मरणों का संकलन है। आपने स्टेज-3 का कैंसर होते हुए भी धैर्य, साहस, दृढ़ संकल्प और जिज्ञासा के बल पर इस गैर संचारी रोग पर विजय पाई। आपकी पुस्तक बताती हैं कि ऐसी बीमारियों पर विजय पाने के लिए अपनों का साथ कितना जरूरी होता है। बीमारी सिर्फ व्यक्ति के शारिरिक अंगों पर ही असर नहीं डालती, बल्कि उसके व्यवहार, सोचने की शक्ति, मानसिक चेतना को भी कमजोर कर देती है। इससे व्यक्ति के व्वयहार में चिड़चिड़ापन आना स्वाभाविक है। जीवन के प्रति विरक्ति होना नैसर्गिक है। ऐसे समय में अपनों का साथ घाव पर मरहम का काम करता है। उनका प्रेम न सिर्फ पीड़ित को मानसिक संबल मिलता है, बल्कि जीवन के प्रति चाह भी बढ़ती है। इस सहयोग को पुस्तक में बड़े ही सुंदरता के साथ उकेरा गया है। लेखिका के बड़े भाई का नौ माह की उपचार यात्रा में चिकित्सकों से मिलने के लिए सुबह तीन बजे लाइन में खड़ा होना बताता है कि हमारे रिश्ते कितने गहरे गुंथे हुए हैं। यही भारतीय समाज और संस्कृति का सौंदर्य है।

लेखिका: डॉ. रामेश्वरी नादान

पुस्तक का मूल्य: 250 रुपये

प्रकाशक: प्रकृति इंटरप्राइजेज, नई दिल्ली

 

 

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