
उमा, देहरादूनः अगर आप चाहते हैं कि छुट्टियां सिर्फ आरामदायक ही नहीं, बल्कि यादगार और रोमांच से भरी हों, तो उत्तराखंड के सीमांत चमोली जिले की पिंडर घाटी आपके इंतजार में है। समुद्रतल से करीब 11,000 फीट की ऊंचाई पर बसी यह घाटी आपको हिमालय की ऊंची चोटियों के नजदीक ले आती है। यहां सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर और गर्मियों में मखमली बुग्याल हर कदम पर यात्रियों का मन मोह लेते हैं। यहां का नौ किमी लंबा ट्रेक घने जंगलों, छलकते झरनों और कुलांचे भरते हिरण-भालू-लोमड़ियों से होकर गुजरता है। दिसंबर से मार्च तक बर्फबारी का जादुई नजारा देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक यहां पहुंचते हैं। हालांकि तापमान माइनस पांच डिग्री तक पहुंच जाता है, इसलिए गर्म कपड़े और पूरी तैयारी जरूरी है। …तो इस सर्दी में बैग पैक कीजिए और निकल पड़िए पिंडर घाटी, जहां प्रकृति, साहस और आध्यात्मिक आस्था तीनों का संगम आपका इंतजार कर रहा है।

भेकलताल: झील किनारे पहली दस्तक
पिंडर यात्रा का पहला पड़ाव है भेकलताल। लोहाजंग से छह किमी आगे फैली इस झील के किनारे मखमली बुग्याल (नर्म घास के मैदान) हैं, जहां टेंट लगाकर ठहरने का अलग ही आनंद है। शांत झील और जंगल यात्रियों को प्रकृति से गहरे जुड़ने का मौका देते हैं।

ब्रह्मताल: विंटरलाइन का अद्भुत दृश्य
भेकलताल से छह किमी और ऊपर चढ़ते ही पहुंचते हैं ब्रह्मताल। 12,250 फीट की ऊंचाई पर स्थित गोलाकार तालाब में हिमालय की चोटियों का प्रतिबिंब देखकर मन रोमांचित हो उठता है। सूर्यास्त के वक्त यहां बनने वाली विंटरलाइन पर्यटकों को अद्भुत अनुभव कराती है। यह ट्रेक वन्यजीवों और पक्षियों से भरा-पूरा है। हालांकि, यहां ठहरने-खाने का इंतजाम पर्यटकों को खुद ही करना पड़ता है।

आजम टाप: आसान ट्रेक, अद्भुत नजारा
जो पर्यटक लंबी पैदल यात्राओं के शौकीन नहीं हैं, उनके लिए आजम टाप सबसे बेहतर जगह है। लोहाजंग से सिर्फ तीन किमी का यह ट्रेक आसान भी है और मनोहारी भी। यहां से गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक फैली हिमालय की चोटियों को निहारा जा सकता है।
मोनाल टाप: पक्षियों और बुरांश का स्वर्ग
वाण गांव से शुरू होने वाला पांच किमी लंबा मोनाल टाप ट्रेक रोमांचक अनुभव देता है। कैल और भोजपत्र के जंगलों से गुजरते हुए यहां हर कदम पर राज्य पक्षी मोनाल दिखाई देता है। मार्च से जून तक खिले लाल, गुलाबी और सफेद बुरांश इस ट्रेक की सुंदरता को और निखार देते हैं। यहां से वेदनी बुग्याल और रूपकुंड भी आसानी से दिखाई देते हैं।
लाटू देवता मंदिर: आस्था का प्रतीक
वाण गांव का लाटू देवता मंदिर स्थानीय आस्था का बड़ा केंद्र है। मान्यता है कि गर्भगृह में मणिधारी नाग विराजमान हैं। इसी कारण मंदिर के कपाट वर्ष में केवल एक बार बैशाख पूर्णिमा को खोले जाते हैं और पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर पूजा करते हैं।
कस्तूरी मृग का घर
भेकलताल और मोनाल टाप का क्षेत्र कस्तूरी मृग का प्राकृतिक आवास है। यहां वन विभाग के नियमों का सख्ती से पालन करना जरूरी है। पर्यटकों को शोर मचाने से बचना होता है और कचरा वापस लाने की जिम्मेदारी भी उनकी होती है।
ठहरने और खाने का इंतजाम
लोहाजंग और वाण गांव में पर्यटकों के लिए पर्याप्त होम-स्टे और गेस्ट हाउस हैं। 500 से 1000 रुपये तक के कमरे आसानी से मिल जाते हैं। यहां स्थानीय व्यंजन आलू की थिचौड़ी, गहत का साग, ओगल और फाफरे की रोटी हर यात्री के स्वाद को नया अनुभव देते हैं।
पर्यटन से बढ़ते अवसर
आज पिंडर घाटी न सिर्फ एक विंटर डेस्टिनेशन बन चुकी है, बल्कि यहां पर्यटन से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए दरवाजे भी खुल रहे हैं। होम-स्टे, होटल, गाइड, पोर्टर और घोड़ा-खच्चर संचालन से उनकी आजीविका जुड़ रही है।
यात्रा टिप्स
सबसे अच्छा मौसम
- दिसंबर से मार्च
- मार्च से जून
जरूरी सामान
- गर्म कपड़े (थर्मल, जैकेट, टोपी, ग्लव्स)
- मजबूत ट्रेकिंग शूज़
- टॉर्च और पावर बैंक
- फर्स्ट एड किट और जरूरी दवाइयां
- कैंपिंग गियर (अगर टेंटिंग करनी हो)
बजट अनुमान
- होम-स्टे/गेस्ट हाउस: ₹500–1000 प्रति रात
- स्थानीय भोजन: ₹200–400 प्रति दिन
- गाइड/पोर्टर: ₹800–1500 प्रतिदिन (जरूरत अनुसार)
ऐसे पहुंचे पिंडर घाटी
- रेलमार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश
- हवाई मार्ग: देहरादून एयरपोर्ट से गौचर तक हेली सेवा, फिर सड़क मार्ग से गोपेश्वर और लोहाजंग
- सड़क मार्ग: कर्णप्रयाग–थराली–देवाल से होते हुए लोहाजंग तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपलब्ध
इन बातों का ध्यान रखें
- ऊंचाई पर मौसम तेजी से बदलता है, सावधानी बरतें
- वन्यजीव दिखने पर शोर न करें
- अपना कचरा वापस लाना न भूलें
- मोबाइल नेटवर्क सीमित है, पहले से तैयारी करें



