उत्तराखंडतीर्थाटनसंस्कृति

मां से हुआ भगवान बदरी नारायण का भावपूर्ण मिलन, देखें वीडियो

Lord Badri Narayan had an emotional meeting with his mother, devotees' eyes welled up with tears

खबर को सुनें


मां से हुआ भगवान बदरी नारायण का भावपूर्ण मिलन, छलछला आईं भक्तों की आंखें

बदरीनाथ, 4 सितंबर 2025: बदरिकाश्रम क्षेत्र में वामन द्वादशी के मौके पर चार सितंबर को माता मूर्ति के भव्य मेले का आयोजन हुआ। इस मौके पर माणा गांव स्थित माता मूर्ति मंदिर में भगवान बदरी नारायण का अपनी मां देवी मूर्ति से हुआ मिलन भावुक कर देने वाला था। इस दृश्य को देख वहां मौजूद भक्तों के नेत्र छलछला आये।
परम्परा के अनुसार वामन द्वादशी पर भगवान नारायण अपनी मां से मिलने बदरीनाथ धाम से तीन किमी दूर माणा गांव स्थित माता मूर्ति मंदिर जाते हैं। कहते हैं कि सतयुग में भगवान ने अपनी मां को वचन दिया था कि साल में एक बार वह उनसे मिलने आये गए और उन्हीं के साथ भोग भी लगाएं। उस वचन का भगवान आज भी निर्वाह कर रहे हैं। वामन द्वादशी पर भी भगवान को दोपहर का भोग उनकी मां देवी मूर्ति के साथ ही लगता है। जब तक भगवान माता मूर्ति मंदिर में रहते हैं, बदरीनाथ मंदिर के कपाट बंद रखे जाते हैं।
इस मौके पर माता मूर्ति मंदिर मेले का भव्य आयोजन भी होता है, जिसमें तीर्थ पुरोहित, हक-हकूकधारी, स्थानीय ग्रामीण और बड़ी संख्या में यात्री शामिल होते हैं। इस बार मौसम की दुश्वारियों के चलते पांच सितंबर तक चारधाम यात्रा स्थगित है, इसलिए यात्री मेले का हिस्सा नहीं बन पाए। इस दौरान बदरीनाथ धाम के मुख्य पुजारी रावल अमरनाथ नंबूदरी, नायाब रावल सूर्यराग नंबूदरी, धर्माधिकारी पंडित राधेकृष्ण थपलियाल, वेदपाठी पंडित रविंद्र भट्ट, मंदिर अधिकारी राजेंद्र सिंह चौहान, पंडित मोहित सती, पंडित अंकित डिमरी, पंडित भास्कर डिमरी आदि मौजूद रहे।
बंधनमुक्त हुए रावल
कपाट खुलने के बाद वामन द्वादशी तक रावल अपने आवास से मंदिर और मंदिर से आवास तक ही आ-जा सकते हैं। लेकिन, भगवान के माता मूर्ति से मिलन के बाद वह इस बंधन से मुक्त हो जाते हैं और कपाट बंद होने तक संपूर्ण बदरीशपुरी में भ्रमण कर सकते हैं।

Global Ganga News

साथियों, Globalganga.com के मंच पर आपका स्वागत करते हुए हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है, जब हम भी वेब पोर्टल की भीड़ में शामिल होने जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ कि भीड़ का हिस्सा होते हुए भी हमेशा भीड़ से अलग दिखने का प्रयास करेंगे। हम चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं का देश-दुनिया में प्रसार हो, उत्तराखंड की बोली-भाषाएं समृद्ध हों और उन्हें स्वतंत्र पहचान मिले, यहां आध्यात्मिक पर्यटन एवं तीर्थाटन का विकास हो …और सबसे अहम बात यह कि इस सब में हमारी भी कुछ न कुछ भागीदारी अवश्य रहे। साथ ही एक विनम्र आग्रह भी है कि अपने कीमती सुझावों से समय-समय पर अवगत कराते रहें। ताकि सुधार की प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहे। अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि हम एक-दूसरे पर भरोसा बनाये रखें। यही भरोसा समाज में संवाद की बुनियाद मजबूत करने का आधार बनेगा। इन्हीं शब्दों के साथ आइये! कामना करें कि- ‘सबके हृदय में सर्वदा संवेदना की दाह हो, हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो। -संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button