
63 साल बाद शहीद को मिला ‘गार्ड आफ आनर’ का सम्मान, आखिर क्यों गुमनाम रहा सेना का यह जांबाज
वीरचक्र विजेता (मरणोपरांत) लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी की स्मृति में पहली बार उनकी पैतृक भूमि बौंसाल में आयोजित हुआ सम्मान समारोह, गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंटल सेंटर की ओर से दिया गया उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’, बौंसाल में उनकी स्मृति में शौर्य द्वार का अनावरण भी हुआ
लैंसडौन, 18 नवंबर 2025: वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में दुश्मन के दांत खट्टे करने वाले वीरचक्र विजेता (मरणोपरांत) लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी को सेना की ओर से पहली बार ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ का सम्मान प्रदान किया गया। नूरानांग दिवस पर 17 नवंबर को सतपुली के पास उनके पैतृक गांव थैर के मुख्य बाजार बौंसाल में आयोजित समारोह में राइफल्स रेजिमेंट सेंटर के कमांडेंट ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी ने उनकी स्मृति में बनाये गए शौर्यद्वार का वर्चुअल अनावरण भी किया।
अपने संबोधन में ब्रिगेडियर नेगी ने कहा कि शहीद लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी ने भारत-चीन युद्ध के दौरान देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था। उनकी स्मृतियां राष्ट्र को सदैव प्रेरित करती रहेंगी। कहा कि थैर गांव निवासी शहीद लांसनायक त्रिलोक सिंह की स्मृति में बना शौर्य द्वार नई पीढ़ी को उनकी वीरता व त्याग से परिचित कराएगा। इस शौर्य द्वार पर उनकी वीरगाथा भी अंकित की गई है। कहा कि कर्तव्य परायणता व शौर्य गढ़वाल राइफल्स की परंपरा रहा है। लांसनायक त्रिलोक सिंह ने गढ़वाल रेजिमेंट की परंपरा का बखूबी निवर्हन किया।
कार्यक्रम में रेजिमेंट मुख्यालय लैंसडौन स्थित अभिलेख कार्यालय में तैनात मेजर पालेंद्र सिंह व मेजर आदित्य यादव भी मौजूद रहे। वहीं, बौंसाल में पूर्व सैनिकों समेत पौड़ी जिले की असवालस्यूं पट्टी के ग्रामीणों ने बड़ी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इससे पूर्व, शहीद त्रिलोक सिंह की शौर्य गाथा को रेखांकित करते हुए रेजिमेंट सेंटर की ओर से उन्हें पुष्पचक्र अर्पित कर श्रंद्धाजलि अर्पित की गई। इस दौरान लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी अमर रहे के जयघोष से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठा। इस मौके पर गढ़वाल रेजिमेंट के पाइप बैंड ने भी मनोहारी प्रस्तुति दी।
असवालस्यूं पट्टी का गौरव हैं शहीद त्रिलोक सिंह
सेना की ओर से शहीद त्रिलोक सिंह नेगी को उनकी पैतृक भूमि में पहली बार ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ का सम्मान दिए जाने से पौड़ी जिले की असवालस्यूं पट्टी में उत्साह व खुशी का माहौल है। दरअसल, वर्ष 1962 के युद्ध में शहीद होने के बाद उन्हें वीरचक्र से तो सम्मानित किया गया, लेकिन उनके पैतृक गांव में कहीं भी उनकी शहादत को याद नहीं किया गया। शहीद की स्मृति में 63 वर्ष बाद पहली बार शौर्य द्वार बनाने के साथ उन्हें सैन्य सम्मान दिया गया। इससे क्षेत्र के लोग स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
शहादत के बाद नहीं ली गई किसी स्तर पर सुध



