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मूल निवास पर सदन में चमोली ने सुनाई ख़री-ख़री

Chamoli spoke out in the House on his original residence

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मूल निवास पर सदन में चमोली ने सुनाई ख़री-ख़री

देहरादून. 5 नवंबर 2025 : उत्तराखंड राज्य की रजत जयंती के अवसर पर आयोजित विधानसभा के विशेष सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को धर्मपुर से भाजपा विधायक विनोद चमोली ने सदन में मूल निवास के मुद्दे पर जमकर गरजे। उन्होंने कहा कि राज्य में मूल निवास की परिभाषा इतनी शिथिल कर दी गई है कि आज कोई भी व्यक्ति जो 15 वर्ष पहले यहां आया हो, वह अब मूल निवासी बन जाता है।
चमोली ने तीखे स्वर में कहा— “बिना मूल निवास के उत्तराखंड को धर्मशाला बना दिया गया है, जिसका लाभ बाहरी लोग उठा रहे हैं और असली पर्वतीय व्यक्ति जस का तस है।” उन्होंने चेताया कि यह स्थिति न केवल राज्य की मूल भावना, बल्कि उत्तराखंड आंदोलन की आत्मा को भी खोखला कर रही है।

विधायक चमोली ने सरकार से मूल निवास की नीति को दोबारा परिभाषित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा किसी दल का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता का प्रश्न है। सड़कों पर उठ रही आवाजों को अनसुना नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि इस पर ठोस नीति नहीं बनी तो राज्य अपनी पहचान और संतुलन दोनों खो देगा।

चमोली ने सदन में कहा कि उत्तराखंड के विकास के लिए अब एक मास्टर प्लान तैयार करना अनिवार्य है, ताकि योजनाएं बिखरी न रहें और सभी क्षेत्रों का संतुलित विकास हो सके। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे औद्योगिक जिलों को नोटिफाइड औद्योगिक क्षेत्र घोषित किया जाए, क्योंकि ये पहले से ही भू-कानून की परिधि से बाहर हैं।

भाजपा विधायक ने राज्य में बढ़ते बाहरी प्रभाव को लेकर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति, जनसंख्या संतुलन और अस्मिता को बचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके वक्तव्य के दौरान सदन का माहौल गंभीर हो गया और सत्ता पक्ष के कई विधायकों ने भी उनकी बातों से सहमति जताई।

चमोली ने यह भी कहा कि राज्य को बने अब लंबा समय हो गया है, लेकिन विकास की दिशा अब भी अस्पष्ट है। “जो भी यहां आ रहा है, वह सिर्फ पैसा कमा रहा है,” उन्होंने कहा। उन्होंने माना कि जनता की यह पीड़ा हर जनप्रतिनिधि सुनता है, परंतु समाधान निकालने की स्थिति में नहीं होता — यह राज्य के हित में बिल्कुल भी उचित नहीं है।

उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी की समस्या पर भी चिंता जताई। कहा कि गोलबंदी जमीन के कारण खेती करना कठिन होता जा रहा है, जबकि पर्यटन के बाद खेती राज्य की सबसे बड़ी आर्थिकी है। “1965 में जब यूपी में चकबंदी की व्यवस्था शुरू हुई थी, तब से अब तक उत्तराखंड में कोई भी सरकार इस दिशा में गंभीर नहीं हुई,” उन्होंने कहा।

विधायक चमोली ने चेताया कि यदि अब भी राज्य सचेत नहीं हुआ तो पलायन की समस्या भयावह रूप ले लेगी और आने वाली पीढ़ी को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे।

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