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गोल्डन बुश रॉबिन का भी उजड़ा घर-संसार

The Golden Bush Robin also lost its home and world

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गोल्डन बुश रॉबिन का भी उजड़ा घर-संसार

देहरादून, 8 अक्टूबर 2025 : देहरादून की सहस्त्रधारा–कार्लीगाड घाटी में हाल ही में आई आपदा ने न केवल इंसानी ज़िंदगियों और घरों को प्रभावित किया, बल्कि वहां के नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्र को भी गहरा आघात पहुंचाया है। भारी वर्षा और भूस्खलन ने इस क्षेत्र की हरियाली, झाड़ियों और नदी किनारे बसे प्राकृतिक आवासों को तहस-नहस कर दिया है। इसी के साथ कई प्रवासी पक्षियों के आशियाने भी उजड़ गए हैं — जिनमें सबसे प्रमुख है खूबसूरत ‘गोल्डन बुश रॉबिन’।

हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच ऊँचे हिमालयी इलाकों (2500–3500 मीटर) से नीचे घाटियों (600–1000 मीटर) की ओर आने वाले ये पक्षी — जिन्हें स्थानीय प्रवासी (Altitudinal Migrants) कहा जाता है — अब अपने पुराने बसेरों से वंचित हो गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सहस्त्रधारा और कार्लीगाड घाटी में जलधाराओं के स्वरूप बदलने, मिट्टी के कटाव और बोल्डरों के जमाव से कई पक्षियों के घोंसले नष्ट हो गए हैं।

गोल्डन बुश रॉबिन, माउंटेन बुलबुल, फिंचेस, फ्लायकैचर्स, वॉबलर्स, थ्रशेस, सनबर्ड्स और ईगल्स जैसी दर्जनों प्रजातियाँ इस क्षेत्र में हर सर्दी में देखी जाती रही हैं। लेकिन इस बार, जब रॉबिन अपने शीतकालीन ठिकाने पर लौटेगी, तो उसे अपने पुराने हरे-भरे बसेरे की जगह अब बोल्डरों और मलबे का ढेर मिलेगा।

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह आपदा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि पारिस्थितिक आपदा भी है, जिसने पक्षियों के भोजन, प्रजनन और प्रवास की श्रृंखला को तोड़ दिया है। अब ये पक्षी आसपास के सुरक्षित क्षेत्रों में नए ठिकाने तलाशने को मजबूर होंगे।

स्थानीय पक्षी-प्रेमी संगठनों और ई-बर्ड प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े वैज्ञानिकों का मत है कि अब सबसे ज़रूरी है इस क्षेत्र का “बर्ड हैबिटेट असेसमेंट” किया जाए, ताकि यह पता चल सके कि किन प्रजातियों की संख्या में कमी आई है और कौन-सी प्रजातियाँ अब नए क्षेत्रों की ओर रुख कर रही हैं।

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