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इन्सान जैसा सुविधाभोगी हो गया है गुलदार

Leopard has become as comfortable as humans.

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इन्सान जैसा सुविधाभोगी हो गया है गुलदार

संघर्ष के बजाय शिकार के लिए चुन रहा आसान रास्ता

देहरादून, 12 दिसंबर 2025:  हालिया वर्षों में न केवल गुलदार का कुनबा बढ़ा है, बल्कि उसके आहार-व्यवहार में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे में वह शिकार के लिए संघर्ष के बजाय आसान राह चुन रहा हैं। शिकार के लिए उसे जंगल में कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, जबकि आबादी में उसे गाय, भेड़, बकरी व कुत्ते के रूप में आसान शिकार मिल जा रहा है। इसलिए उसमें आबादी के करीब आसान शिकार की तलाश पूरी करने की प्रवृत्ति विकसित होती जा रही है। मशहूर शिकारी जाय हुकिल का भी ऐसा ही मानना है।

गुलदार जंगल के सबसे चालाक जानवरों में शुमार है। जिस तरह इन्सान हर कार्य के लिए आसान रास्ता तलाशता है, देखने में आ रहा है कि गुलदार ने भी ठीक उसी तरह भोजन की आपूर्ति के लिए आसान राह तलाश ली है। जंगल में हिरण आदि जानवरों का शिकार करने के लिए उसे खासी मेहनत करनी पड़ती है। कई बार तो पास आया शिकार भी चकमा दे जाता है और गुलदार की सारी ऊर्जा भी संघर्ष में जाया हो जाती है। ऐसे में आबादी करीब रहना उसे ज्यादा मुफीद लगने लगा है। कारण बस्ती के आसपास शिकार उसे आसानी से मिल जा रहा है और उसकी सहप्रवृत्ति की चपेट में आकर आये दिन इंसान भी उसका शिकार बन जा रहा है।

47 लोग बन चुके शिकार, 415 किए घायल

उत्तराखंड में इस साल वन्यजीवों (बाघ, गुलदार, भालू आदि) के हमलों में जो 47 लोग मारे गए, उनमें अधिकांश का शिकार गुलदार ने ही किया और वह भी गांवों के आसपास ही। इतना ही नहीं, जो 415 लोग जनवरी 2025 से अब तक जंगली जानवरों के हमलों में घायल हुए उनमें भी ज्यादात्तर पर गुलदार ने ही हमला किया। ऐसे में कहना न होगा कि गुलदार की संघर्ष से शार्टकट की ओर आने की यह प्रवृत्ति भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है।

पलायन और खेती सिमटने से बढ़ा संकट

देखा जाए तो जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों के पीछे पहाड़ से बढ़ता पलायन और खेती का सीमित होना भी बड़ी वजह है। बीते दो दशक में पर्वतीय अंचल से पलायन की रफ़्तार बढ़ी है। इससे खेती का दायरा लगातार सिमटता चला गया। नतीजा जिन खेतों में फसलें लहलहाती थीं, उनमें अब बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई हैं। यहां तक कि मकानों के बंजर पड़ने से उन्हें भी झाड़-झंकाड़ ने घेर लिया है। जब गांवों में लोगों की चहल-पहल रहती थी, तब घरों के आसपास व गांव की पगडंडियों की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता था। इससे दूर से ही जानवरों के मूवमेंट का भी पता चल जाता था। लेकिन, अब गिनती के ही लोग गांवों में रह गए, आखिर वे क्या जो करें। जाहिर है ऐसे में गुलदार को आसान ठौर मिल गया है।

गुलदार बढ़ रहे, उनका आहार घट रहा

पिछले कुछ वर्षों में गुलदार तेजी से बढ़े हैं, जबकि जंगल की अपनी सीमा है। फिर प्रकृति ने गुलदार को मांसाहारी बनाया है, लेकिन जंगल में हिरण, घुरल, काकड़, सेही, सियार आदि जीवों की भारी कमी होने के चलते उसे नियमित भोजन नहीं मिल पा रहा। जाहिर है वह कोई न कोई विकल्प तो तलाशेगा ही। यह भी न भूलें कि गुलदार कभी लक्ष्य मानकर इन्सान पर हमला नहीं करता, भूख उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करती है और यही मजबूरी फिर उसकी आदत में शुमार हो जाती है।

फिर कैसे खत्म होगा गुलदार का आतंक

ऐसे में सवाल उठता है कि फिर क्या किया जाय और जवाब है परिणामदायक कार्य। मसलन, आबादी के आसपास किसी क्षेत्र में गुलदार की सक्रियता दिखती है, तो उसे तत्काल ट्रैंकुलाइज कर दूर कहीं सुरक्षित क्षेत्र में छोड़ना सुनिश्चित किया जाय। लेकिन, वह सघन वन क्षेत्र होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो इसका सीधा-सा मतलब है कि आपको इन्सान की सुरक्षा की चिंता नहीं है और आप मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं।

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