उत्तराखंडधर्म-परम्पराएंसंस्कृति

दशानन को नहीं मिली GST छूट… जानिए वजह

खबर को सुनें


देहरादून, 30 सितंबर 2025: देहरादून की गलियों में इस समय बांस की खड़खड़ाहट, रंगीन कागजों की सरसराहट और हथौड़ों की थाप सुनाई दे रही है। दशहरा नजदीक है और रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के विशाल पुतले तेजी से आकार ले रहे हैं। लेकिन, इस बार इन पुतलों की कीमतें आयोजकों की जेब पर भारी पड़ रही हैं।

हाल ही में सरकार ने कई वस्तुओं पर GST में छूट दी थी, जिससे बाजार में तमाम सामान सस्ते हो गए। लोग उम्मीद कर रहे थे कि इसका असर त्योहारों पर भी दिखेगा। मगर रावण-दहन की परंपरा निभाने वाले आयोजकों और कारीगरों के लिए हालात उलट साबित हुए हैं। बांस, रस्सी और कागज के दाम इतने बढ़ गए कि पुतलों की लागत करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है। करीब 50 फीट ऊंचे पुतले में आठ कुंतल तक बांस लगता है।

कारीगरों की जुबानी

परेड ग्राउंड में पुतले तैयार कर रहे कारीगर बताते हैं,
“45 फीट का पुतला पहले 60 हजार में तैयार हो जाता था, अब इसकी कीमत 75 हजार से ऊपर पहुंच गई है। इसमें आतिशबाजी अलग से लगती है। बांस, रस्सी और मजदूरी सब महंगी हो गई है। GST छूट का असर हमारी सामग्री पर नहीं दिखा।”

आयोजकों की चिंता

पटेलनगर की एक समिति के आयोजक कहते हैं, “पहले 50 फीट का पुतला एक लाख रुपये में तैयार हो जाता था, इस बार इसकी लागत सवा लाख से ऊपर है। त्योहार की परंपरा निभानी है, इसलिए पुतलों की ऊंचाई कम नहीं कर रहे।”

मेले की रौनक और बच्चों का उत्साह

परेड ग्राउंड और अन्य स्थलों पर पुतला दहन के साथ-साथ मेले की तैयारियां भी जोरों पर हैं। कहीं झूले लगाए जा रहे हैं तो कहीं खाने-पीने की दुकानों की सजावट हो रही है। बच्चों की आंखों में मेले के झूलों और गुब्बारों की चमक साफ झलक रही है।
गोलगप्पे, जलेबी, समोसे और चाट की खुशबू से वातावरण महकने लगा है। महिलाएं खरीदारी की लिस्ट बना रही हैं तो बच्चे आतिशबाजी की गूंज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

उत्सव का संदेश बरकरार

महंगाई का असर जरूर है, पर दून में दशहरे का उत्साह फीका नहीं पड़ा। शाम ढलते ही जब आतिशबाजी के साथ रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले धराशायी होंगे, तो आकाश रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा उठेगा।

Global Ganga News

साथियों, Globalganga.com के मंच पर आपका स्वागत करते हुए हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है, जब हम भी वेब पोर्टल की भीड़ में शामिल होने जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ कि भीड़ का हिस्सा होते हुए भी हमेशा भीड़ से अलग दिखने का प्रयास करेंगे। हम चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं का देश-दुनिया में प्रसार हो, उत्तराखंड की बोली-भाषाएं समृद्ध हों और उन्हें स्वतंत्र पहचान मिले, यहां आध्यात्मिक पर्यटन एवं तीर्थाटन का विकास हो …और सबसे अहम बात यह कि इस सब में हमारी भी कुछ न कुछ भागीदारी अवश्य रहे। साथ ही एक विनम्र आग्रह भी है कि अपने कीमती सुझावों से समय-समय पर अवगत कराते रहें। ताकि सुधार की प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहे। अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि हम एक-दूसरे पर भरोसा बनाये रखें। यही भरोसा समाज में संवाद की बुनियाद मजबूत करने का आधार बनेगा। इन्हीं शब्दों के साथ आइये! कामना करें कि- ‘सबके हृदय में सर्वदा संवेदना की दाह हो, हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो। -संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button