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डंडी पर लादकर कंधे में पांच किमी दूर अस्पताल पहुंचाया मरीज

The patient was carried on a stick and taken to the hospital five kilometers away

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डंडी पर लादकर कंधे में पांच किमी दूर अस्पताल पहुंचाया मरीज

आज तक मोटर मार्ग से नहीं जुड़ पाया सीमांत चमोली जिले के देवाल ब्लाक का ऐरठा गांव, बीमार को डंडी-कंडी से अस्पताल पहुंचाना बना गई है ग्रामीणों की नियति, किससे करें फरियाद, कोई सुनने वाला नहीं

चमोली, 13 दिसंबर 2025: उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल शर्मशार कर देने वाला है। विशेषकर अंतराल के गांवों में तो बीमार का कोई सुधलेवा तक नहीं है। अस्पताल की तो छोड़िये, गांव मोटर मार्ग तक से नहीं जुड़ पाए हैं। सीमांत चमोली जिले में देवाल ब्लाक के कुमाऊं सीमा से सटे ऐरठा गांव में तब इसकी झलक देखने को मिली, जब स्थानीय निवासियों ने बीमार पूरन राम को डंडी के सहारे पांच किमी पैदल चलकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र देवाल पहुंचाया। हैरत देखिए कि वहां से भी प्राथमिक उपचार के बाद मरीज को हायर सेंटर श्रीनगर रेफर करना पड़ा। ऐसे में अंदाज लगाया जा सकता है कि अंतराल में लोग किस तरह कष्टों में जीवन यापन करने को विवश हैं।

ग्राम प्रधान प्रेमा देवी ने बताया कि अनुसूचित जाति बहुल ऐरठा गांव आज तक सड़क से नहीं जुड़ पाया है। ऐसे में बीमार और गर्भवती महिलाओं को डंडी-कंडी से अस्पताल पहुंचाना लोगों की नियति बन गया है। शुक्रवार को भी यही कहानी दोहराई गई और चार माह से बीमार पूरन राम की तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर ग्रामीणों ने अपने स्तर से पैसों की व्यवस्था कर डंडी के सहारे जैसे-तैसे उन्हें अस्पताल पहुंचाया। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह इलाज नहीं करा पा रहे थे। अहम बात यह कि लोग लगातार गांव को मोटर मार्ग से जोड़ने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही।

गांव के सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र कुमार ने बताया कि ऐरठा के लिए पदमला-कजेरू-ऐरठा-ओडर आठ किमी मोटर मार्ग को वर्ष 2021 में पांच दिसंबर को स्वीकृति मिली थी। इस पर पिंडर नदी में पुल भी बनना है। मार्ग का सर्वे हो चुका है, लेकिन अभी वित्तीय स्वीकृति नहीं मिलने से कार्य शुरू नहीं हो पा रहा और इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है क्षेत्र के ग्रामीणों को। वहीं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का हाल यह है कि वहां न डॉक्टर हैं न मेडिकल स्टाफ ही। दवाओं का हाल तो खैर पूछिए ही मत। जब शहरों के अस्पतालों में मरीजों को दवाइयां नहीं मिलतीं तो गांव-देहात में कौन है पूछने वाला।

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