अंतरराष्ट्रीयअध्यात्मउत्तराखंडतीर्थाटनधरोहरधर्म-परम्पराएंपर्यटनराष्ट्रीयसंस्कृति

ट्रेवलर्स हैंडबुक ‘प्रकृति पथ नंदा पथ’ लोक को अर्पित

Traveller's Handbook 'Nature Path Nanda Path' dedicated to the public

खबर को सुनें


ट्रेवलर्स हैंडबुक ‘प्रकृति पथ नंदा पथ’ लोक को अर्पित

डॉ सर्वेश उनियाल और हरीश भट्ट हैं विनसर प्रकाशन और लेखक गांव की ओर से प्रकाशित इस ट्रेवलर्स हैंडबुक के लेखक

दिल्ली, 18 जनवरी, 2026: हिमालयी महाकुंभ नंदा राजजात की पथ प्रदर्शक ट्रेवलर्स हैंडबुक प्रकृति पथ-नंदा पथ का विश्व पुस्तक मेला भारत मण्डपम के लेखक मंच पर भव्य लोकार्पण हुआ। विनसर प्रकाशन और लेखक गांव की ओर से प्रकाशित इस ट्रेवलर्स हैंडबुक के लेखक डॉ सर्वेश उनियाल और हरीश भट्ट हैं। इस दौरान नंदा देवी राजजात-2026 पर परिचर्चा भी हुई। हालांकि, 2026 में मलमास पड़ने के कारण श्री नंदा राजजात समिति ने इस आयोजन को एक साल आगे बढ़ा दिया है यानी अब राजजात का आयोजन 2027 में होगा।

ट्रेवलर्स हैंडबुक का लोकार्पण दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कालेज की प्राचार्य प्रो.रमा, उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी के पूर्व उपनिदेशक निशीथ कुमार, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल गणी, शिक्षाविद गढ़वाल हितैषिणी सभा के महा सचिव डॉ पवन मैठाणी और पुणे (महाराष्ट्र) से आए हिमालयन ट्रेवलर रामचन्द्र बाबूराव जगताप ने किया गया।

समारोह में मौजूद आगंतुकों का स्वागत करते हुए लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणी ने कहा कि नंदा राजजात हिमालयी क्षेत्र की 280 किमी लंबी पैदल यात्रा है। हर बारह साल में होने वाली एशिया की यह सबसे लंबी यात्रा इस वर्ष आयोजित होगी। गांव, जंगल, दर्रा और ग्लेशियरों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा बेहद रोमांचक है,  जो लगभग 14,600 फीट की ऊंचाई पर होमकुंड में पूर्णता को प्राप्त होती है।

गणी ने कहा कि यह यात्रा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में पूरी दुनिया में जानी जाती है। यह सिर्फ तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति, लोक संस्कृति और हिमालयी परिवेश का अद्भुत गुलदस्ता है। इसका हिस्सा बनकर पता चलता है पहाड़ की बेटी नंदा का लोक कितना समृद्ध है। जहां जागर, चांचड़ी,  दांकुड़ी और झोड़ा की मधुर लहरियों में खो जाने का मन करता है।

हंसराज कॉलेज की प्राचार्य प्रोफेसर रमा ने कहा कि नंदा देवी राजजात का हिस्सा बनने वाले यात्रियों के लिए यह पुस्तक पूरे गाइड का कार्य करेगी। इस पुस्तक की नजर से यह यात्रा और अधिक सुगम होने वाली है। उन्होंने कहा कि डॉ सर्वेश उनियाल ने जितने सलीके से यह पुस्तक लिखी है, उसी संजीदगी के साथ देश के पहले लेखक गांव पर भी कार्य करने की आवश्यकता है।

उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी के पूर्व उपनिदेशक निशीथ कुमार ने कहा कि हिमालय की यह यात्रा हिमालय के प्रति मानव मन की संजीदगी, प्रकृति के प्रति मानव के लगाव और देवत्व वाले भाव का जीता-जागता उदाहरण है। जहां भगवती नंदा की डोली ले जाने वाले श्रद्धालु इतनी लंबी यात्रा को नंगे पांव करते हैं। इससे यात्रा में शामिल होने वाले लोगों की हिमालयी प्रकृति और बुग्यालों के प्रति भावना को समझा जा सकता है।

शिक्षाविद् डॉ. पवन मैठाणी ने कहा, मेरा नंदा देवी राजजात से एक अलग तरह का लगाव है। इस जात के बहाने मुझे मेरी पीएचडी में शत-प्रतिशत अंक मिले। मेरी पीएचडी कम्प्यूटर साइंस से थी और मेरी व्यावहारिक परीक्षा में मुझसे नंदा देवी राजजात के बारे में पूछा गया। सिर्फ यह जवाब देने पर मुझे शत-प्रतिशत अंक मिल गये। कहा कि राजजात की यह परंपरा हमारी मातृ शक्ति के सम्मान की परंपरा है, बेटी के प्रति अनुराग की परंपरा है। यह हमारे लोक में भक्ति और भक्ति में शक्ति के भाव की स्थापना का पर्व है।

पुणे (महाराष्ट्र) से आए हिमालयन ट्रेवलर रामचन्द्र बाबूराव जगताप ने कहा, मुझे नंदा देवी राजजात का समाचार उस कागज में दिखा, जिसमें रखी पकोड़ियां मैं खा रहा था। यह 2010 की बात है। समाचार पत्र की उस कतरन का पीछा करते हुए मैं कई महीने बाद उस पूरे समाचार को पढ़ सका जो नंदा देवी राजजात पर केंद्रित था। उस समाचार को पढ़कर मैंने 2014 में नंदा देवी राजजात करने का निर्णय लिया।

70-वर्षीय बाबूराव जगताप ने बताया कि इस यात्रा के लिए पहले हम पांच दोस्त तैयार हुए और धीरे-धीरे एक-एक कर कम होते चले गए। आखिर में मैं अकेला था।ट्रेवलर्स हैंडबुक ‘प्रकृति पथ-नंदा पथ’ के वर्ष 2014 में छपे दूसरे संस्करण को मैंने राजजात के दौरान नंदकेसरी पड़ाव में खरीदा था। संयोग देखिए कि आज मैं उसी ट्रेवलर्स हैंडबुक के तीसरे संस्करण के लोकार्पण समारोह में बतौर वक्ता मंच पर विराजमान हूं।

Global Ganga News

साथियों, Globalganga.com के मंच पर आपका स्वागत करते हुए हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है, जब हम भी वेब पोर्टल की भीड़ में शामिल होने जा रहे हैं, इस संकल्प के साथ कि भीड़ का हिस्सा होते हुए भी हमेशा भीड़ से अलग दिखने का प्रयास करेंगे। हम चाहते हैं कि उत्तराखंड की संस्कृति एवं परंपराओं का देश-दुनिया में प्रसार हो, उत्तराखंड की बोली-भाषाएं समृद्ध हों और उन्हें स्वतंत्र पहचान मिले, यहां आध्यात्मिक पर्यटन एवं तीर्थाटन का विकास हो …और सबसे अहम बात यह कि इस सब में हमारी भी कुछ न कुछ भागीदारी अवश्य रहे। साथ ही एक विनम्र आग्रह भी है कि अपने कीमती सुझावों से समय-समय पर अवगत कराते रहें। ताकि सुधार की प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहे। अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि हम एक-दूसरे पर भरोसा बनाये रखें। यही भरोसा समाज में संवाद की बुनियाद मजबूत करने का आधार बनेगा। इन्हीं शब्दों के साथ आइये! कामना करें कि- ‘सबके हृदय में सर्वदा संवेदना की दाह हो, हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो। -संपादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button