देहरादून की रामलीला: 157 सालों की जीवंत परंपरा
नवरात्र में शुरू होगा मंचन

देहरादून की रामलीला आज भी उतनी ही जीवंत है। मंच सज्जा, कलाकारों का अभिनय और राग-रागनियों का संगम दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। 157 साल पुरानी यह परंपरा न केवल संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है, बल्कि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने का काम करती है।
देहरादून, 21 सितंबर 2025: शहर की सांस्कृतिक धरोहर में रामलीला का स्थान आज भी उतना ही खास है, जितना 157 साल पहले था। यह यात्रा शुरू हुई थी 1868 में लाला जमुनादास भगत के प्रयासों से। देवगन, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) मूल के लाला जमुनादास का परिवार लगभग 200 वर्ष पहले देहरादून आया और यहीं बस गया। 1850 में जन्मे लाला जमुनादास ने देखा कि शहर में ऐसा कोई आयोजन नहीं है जो श्रीराम के चरित्र और जीवन को जीवंत रूप में पेश करे, और इसी भावना के साथ उन्होंने महज 18 वर्ष की आयु में दोस्तों के साथ मिलकर श्री रामलीला समिति बनाई और पहली रामलीला मंचित की।
इतिहासविदों का मानना है कि रामलीला की शुरुआत 16वीं सदी में हुई। 18वीं सदी के मध्य तक यह परंपरा उत्तराखंड में भी पहुँच गई। कुमाऊं में 1860 में अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मंदिर में पहली रामलीला आयोजित हुई। पौड़ी की रामलीला ने 1897 में पारसी थियेटर शैली और राग-रागनियों के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। 1908 से भोलादत्त काला, पूर्णचंद्र त्रिपाठी, कोतवाल सिंह नेगी और तारादत्त गैरोला के प्रयासों से इसे और व्यापक और संगठित रूप मिला।
रामलीला केवल नाट्य और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक शिक्षा का स्रोत भी रही है। राम भक्तों का मानना है कि त्रेता युग में श्रीराम के वनवास के समय अयोध्यावासियों ने उनकी बाल लीलाओं का अभिनय किया था। तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से इसे आम भाषा में पहुँचाया, जिससे काशी, चित्रकूट और अवध में रामलीला की परंपरा मजबूत हुई।
दिलचस्प बात यह है कि रामलीला केवल भारत तक सीमित नहीं रही। दक्षिण-पूर्व एशिया में जावा, थाईलैंड, म्यांमार और जापान तक इसकी झलक मिलती है। जावा के सम्राट वलितुंग के समय से लेकर थाई और बर्मी राजभवनों में इस नाट्य परंपरा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।



